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खीरी में बंजर होने की कगार पर तराई की मिट्टी, जैविक कार्बन की मात्रा घटकर महज 0.3% बची

Published: Fri, 18 Sep 2026 08:52 AM (IST)

लखीमपुर खीरी सहित तराई क्षेत्र की मिट्टी में जैविक कार्बन की भारी कमी पाई गई है, जिससे खेतों की उर्वरा ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. लखीमपुर खीरी की मिट्टी में जैविक कार्बन की भारी कमी।

  2. रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की सेहत खराब।

  3. जैविक खाद और मृदा परीक्षण से उर्वरा शक्ति बचाएं।

राकेश मिश्र , लखीमपुर। खेतों में लगातार रासायनिक खादों के इस्तेमाल और जैविक पदार्थों की अनदेखी का असर अब मिट्टी की सेहत पर साफ दिखाई देने लगा है। कृषि विभाग के मृदा नमूना अभियान में जिलेभर से लिए गए करीब 6500 नमूनों की जांच में मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बेहद कम मिली है।

जिले के सभी ब्लाकों में जैविक कार्बन औसतन महज 0.3 प्रतिशत है, जबकि अच्छी और उपजाऊ मिट्टी में इसकी मात्रा 0.5 से 1 प्रतिशत तक होनी चाहिए।

विशेषज्ञों के मुताबिक यदि स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ तो खेतों की उर्वरा शक्ति लगातार घटती जाएगी और आने वाले समय में जमीन को उपजाऊ बनाए रखना किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। ऐसे तो तराई की बेहद उपजाऊ मानी जाने वाली तराई की मिट्टी बंजर हो जाएगी। इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

जैविक कार्बन मिट्टी की सेहत का महत्वपूर्ण आधार है। इसकी कमी से मिट्टी की संरचना बिगड़ती है और वह कठोर होने लगती है। इसका सीधा असर पौधों की जड़ों के फैलाव पर पड़ता है।

मिट्टी की पानी रोकने की क्षमता भी घट जाती है, जिससे सिंचाई के बाद नमी अधिक समय तक टिक नहीं पाती। सबसे गंभीर असर मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों पर पड़ता है। जैविक जीवन कमजोर होने से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है।

कार्बन की कमी के चलते किसान यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों पर अधिक निर्भर होते हैं। खाद की मात्रा बढ़ाने के बावजूद यदि मिट्टी की संरचना और जैविक जीवन कमजोर है तो फसल को संतुलित पोषण नहीं मिल पाता। इसका असर उत्पादन, गुणवत्ता और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी पड़ता है।

खीरी में करीब नौ लाख किसान हैं। इनमें 7.18 लाख किसान प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का लाभ पा रहे हैं। इतनी बड़ी किसान आबादी के सामने मिट्टी की सेहत सुधारना बड़ी चुनौती है।

खेतों में गोबर की खाद, कंपोस्ट, वर्मी कंपोस्ट और हरी खाद का इस्तेमाल बढ़ाने के साथ फसल अवशेषों को जलाने के बजाय मिट्टी में मिलाना जरूरी है। मृदा जांच के आधार पर पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल ही खेतों को लंबे समय तक उपजाऊ बनाए रखने का रास्ता है।

मिट्टी की सेहत सुधारना जरूरी

मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा कम होना चिंता का विषय है। इससे मिट्टी की जल धारण क्षमता, संरचना और उसमें मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव प्रभावित होते हैं। किसानों को मृदा जांच के आधार पर संतुलित उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए।

खेत में गोबर की सड़ी खाद, कंपोस्ट, वर्मी कंपोस्ट और हरी खाद का इस्तेमाल बढ़ाने के साथ फसल अवशेषों को जलाने के बजाय खेत में मिलाना चाहिए। जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाकर ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति को लंबे समय तक बनाए रखा जा सकता है।
गिरीश चंद्र, उप निदेशक कृषि

कहां कितना मिला कार्बन

जिला नमूनों की संख्या कार्बन प्रतिशत
लखीमपुर 6500 0.3 प्रतिशत
बलरामपुर 4927 0.5 प्रतिशत
गोंडा 1700 0.36 प्रतिशत
अमेठी 4700 0.39 प्रतिशत
श्रावस्ती 2300 0.28 प्रतिशत