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62 की उम्र में सीखा पढ़ना… गणेश सिंह ने साक्षर होकर बदली जिंदगी, पत्नी रेशमा भी पढ़ने लगीं रामायण

Published: Tue, 08 Sep 2026 09:22 PM (IST)

72 वर्षीय गणेश सिंह ने दूसरों पर निर्भरता खत्म करने के लिए साक्षरता अभियान से जुड़कर पढ़ना सीखा, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा।

गनेश सिंह अपनी पोती को पढ़ाते हुए। जागरण

गनेश सिंह अपनी पोती को पढ़ाते हुए। जागरण

HighLights

  1. गणेश सिंह ने 72 वर्ष की उम्र में पढ़ना सीखा।

  2. साक्षरता से उनका आत्मविश्वास बढ़ा, बैंक काम खुद करते।

  3. पत्नी रेशमा देवी भी अब रामायण व किताबें पढ़ती हैं।

राकेश मिश्र, लखीमपुर। दउदापुर गांव के 72 वर्षीय गणेश सिंह ने जब पहली बार अपने हाथ से अपना नाम लिखा, तो यह उनके लिए आत्मविश्वास की पहली इबारत थी। अब तक उन्हें हर जरूरी कागज और संदेश समझने के लिए दूसरों का सहारा लेना पड़ता था। जब उन्होंने खुद एक पूरा वाक्य पढ़ा, तो चेहरे पर आई खुशी ने वर्षों की झिझक को पीछे छोड़ दिया।

बैंक में लगाते थे अंगूठा 

गणेश सिंह बताते हैं कि पहले बैंक में पैसे निकालने के लिए अंगूठा लगाते थे और फार्म भरवाने के लिए किसी और की मदद लेनी पड़ती थी। मोबाइल पर संदेश आने पर भी दूसरों से पढ़वाना पड़ता था। इस स्थिति ने उन्हें पढ़ाई की ओर प्रेरित किया।

वर्ष 2015 में साक्षर भारत अभियान से जुड़ने का अवसर मिला। जन शिक्षण संस्थान ने गणेश और उनकी पत्नी 65 वर्षीय रेशमा देवी को साक्षर बनाने का प्रयास शुरू किया। शुरुआत में उम्र के कारण झिझक थी, लेकिन सीखने की इच्छा ने संकोच पर विजय प्राप्त की।

पत्नी भी रामायण और अन्य पुस्तकें पढ़ने लगी

अक्षर पहचानने से शुरू हुआ उनका सफर अब शब्दों और वाक्यों तक पहुंच गया है। अपना नाम खुद लिखने के बाद गणेश का आत्मविश्वास बढ़ा। अब वह बैंक के जरूरी काम खुद कर लेते हैं और मोबाइल पर आए संदेश भी पढ़ लेते हैं। उनकी पत्नी रेशमा देवी भी अब रामायण और अन्य पुस्तकें पढ़ने लगी हैं।

गणेश की साक्षरता का असर अगली पीढ़ी तक भी पहुंचा। उन्होंने अपने बेटे धर्मेंद्र को भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया, जिसने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की और वर्तमान में उत्तराखंड के रुद्रपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी कर रहा है।

गणेश कहते हैं कि पहले लगता था कि पढ़े-लिखे लोगों के बिना हमारा कोई काम नहीं हो सकता। अब किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती। पढ़ना सीखकर लगा कि अपने जीवन पर हमारा भी अधिकार है।

उनकी कहानी यह दर्शाती है कि अक्षर ज्ञान की कोई उम्र नहीं होती। कभी अंगूठा लगाने तक सीमित रहने वाला हाथ जब अपना नाम लिखता है, तो उसके साथ आत्मसम्मान और गरिमा भी लौटती है।