लखीमपुर : कस्ता विधानसभा क्षेत्र यूं तो कई मायनों में पिछड़ा है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं, बालिकाओं की शिक्षा में पिछड़ापन यहां की सबसे बड़ी समस्या है । क्षेत्र में बालिकाओं की उच्च शिक्षा के लिए एक भी सरकारी स्कूल नहीं है । इलाके में जनसुविधाओं की कमी है। कुटीर उद्योग न होने से रोजगार के लिए ग्रामीणों को दूरदराज जाना पड़ता है। गांवों को जोड़ने वाली सड़कों की खराब स्थित क्षेत्र के पिछड़ेपन को बयां करती है। विधानसभा की यह स्थिति तब है, जब नवसृजित कस्ता से चुने गए अब तक के दोनों विधायक सत्तापक्ष से रहे हैं। कस्ता विधानसभा का इतिहास 2008 के परिसीमन में तत्कालीन हैदराबाद व पैला विधानसभा क्षेत्र को काट कर कस्ता विधानसभा का गठन हुआ था। इस सीट पर पहला चुनाव 2012 में हुआ। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कस्ता की सीमाएं गोला, श्रीनगर, लखीमपुर, हरगांव, महोली व मोहम्मदी विधानसभा क्षेत्रों को छूती हैं। कस्ता विधानसभा धौरहरा लोकसभा के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है।

पहली बार सपा फिर भाजपा ने लहराया परचम

नवसृजित कस्ता विधानसभा क्षेत्र ने अब तक दो विधायक दिए हैं। पहली बार 2012 में इस सीट पर चुनाव हुआ था। जिसमें सपा के सुनील कुमार लाला ने बसपा के सौरभ सिंह सोनू को 26 हजार वोटों से हराया था। सुनील कुमार को 45 प्रतिशत जबकि सौरभ सिंह को 32 प्रतिशत वोट मिले थे। दूसरा चुनाव 2017 में हुआ, जिसमें सौरभ सिंह ने पाला बदल कर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और विधायक बने। सौरभ सिंह ने सपा के सुनील लाला को 24 ह•ार वोटों से हराया। सौरभ सिंह को 44 प्रतिशत वोट मिले, वहीं सुनील कुमार को 32 प्रतिशत वोट मिले थे। 2022 का चुनाव कस्ता विधानसभा के लिए तीसरा चुनाव होगा। पार्टियों के लिए भाग्यशाली रही कस्ता विधानसभा

पार्टियों के लिए कस्ता विधानसभा क्षेत्र अब तक भाग्यशाली साबित हुआ है। क्षेत्र के लोगों ने जिस पार्टी का विधायक चुना। उसी पार्टी की सरकार बनी। पहली बार 2012 में सपा के सुनील कुमार विधायक चुने गए। तब सपा की सरकार बनी थी। अगली बार 2017 में भाजपा के सौरभ सिंह विधायक चुने गए। तब भाजपा की सरकार बनी। दोनों बार चुनी गई सरकारों ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। कस्ता के चुनाव में प्रभावी मुद्दे

विधानसभा क्षेत्र की बदहाल स्थिति इस चुनाव में मुद्दा बन सकती है। बालिकाओं को उच्च शिक्षा के लिए भटकना हो या रोजगार के लिए ग्रामीणों का पलायन। चुनाव में मतदाता इन मुद्दों को ध्यान में रख कर वोट कर सकते हैं। ग्रामीण इलाकों में सड़कों की बदहाल स्थिति है। मदारपुर से परसेहरा जाने वाले मार्ग पर रपटा पुल बरसात में जानलेवा हो जाता है। दर्जनों गांवों के लोग जान जोखिम में डाल कर निकलते हैं। मड़रिया से चपरदहा जाने वाली सड़क भी खराब है, जिससे लोग काफी दूर घूम कर जाते हैं। इसी तरह क्षेत्र में कई मार्गों पर पुल - पुलियों के निर्माण की आवश्यकता भी है।

सबसे ज्यादा और कम पड़े वोट

2017 के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 89 प्रतिशत वोट पिपरी नरायनपुर गांव में बूथ संख्या 91 पर पड़े थे। यहां कुल 479 वोटों में से 427 वोट पड़े थे। इससे पहले 2012 और 2008 के विधानसभा चुनावों में भी इस बूथ पर 80 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ था। वहीं सबसे कम 47.17 प्रतिशत वोट खखरा के बूथ संख्या 233 पर पड़े थे। यहां कुल 1323 मतों में मात्र 624 बोट ही पड़े थे। इस गांव में पूर्व के विधानसभा चुनावों में भी 50 प्रतिशत के आसपास ही मतदान हुआ था। ग्रामीणों ने चंदा कर बनवाया था पुल

विधानसभा क्षेत्र के भावदाग्रांट गांव के पास कठिना नदी पर ग्रामीणों ने चंदा कर पुल बनाया। भावदा, हरीशपुर, हकीमपुर सहित दर्जनों गांवों के लिए यह पुल बहुत आवश्यक था। जब प्रशासन ने नहीं सुना तो ग्रामीणों ने खुद कमर कसी। प्रधान सोबरन लाल ने बताया कि ग्रामीणों ने चंदा कर काम शुरू किया। बाद में विधायक सौरभ सिंह ने भी मदद की। पुल बनाने में करीब दस लाख रुपये खर्च हुए होंगे। पुल बनने से कुंभी चीनी मिल की दूरी कम हो गई। पहले लोगों को काफी घूम कर जाना पड़ता था। साथ ही मुख्य मार्ग से दूरी भी कम हुई। 143 विधानसभा कस्ता

कुल मतदाता 309332

पुरुष मतदाता 164772

महिला मतदाता 144543

अन्य 17

बढ़े वोट 10377

मतदान केंद्र 215

पोलिग बूथ 361

Edited By: Jagran