लखीमपुर : धौरहरा विधानसभा का चुनाव इस बार बहुत रोचक होने वाला है। दूसरे शब्दों में कहें तो चुनाव यह तय करेगा कि यहां का मतदाता चेहरों को वोट करता है अथवा पार्टी को। यह स्थिति इसलिए बनी है कि 2017 में एक दूसरे के प्रतिद्वंदी रहे इस क्षेत्र के तीन दिग्गज इस बार एक मंच पर हैं। अब भाजपा के सामने अपना नया चेहरा चुनने की चुनौती है तो सपा के सामने यह कि वह पुराने धुरंधरों में किस एक को चेहरा बनाए।

माना जाता रहा है कि धौरहरा का मतदाता पार्टी को नहीं व्यक्ति को वोट करता है। यही वजह रही है कि यहां 1951 से लेकर 2017 के चुनाव तक चेहरे तो रिपीट हुए हैं, लेकिन पार्टी नहीं। धौरहरा से सर्वाधिक पांच बार निर्दलीय विधायक चुना जाना भी यहां के मतदाता का व्यक्तिवादी होना दर्शाता रहा है। अब जरा आंकड़ों पर गौर फरमाइए। 2017 के चुनाव में बाला प्रसाद अवस्थी भाजपा प्रत्याशी थे। उन्हें वोट मिले थे 79809। यशपाल चौधरी सपा प्रत्याशी थे। उन्हें 76456 वोट मिले थे। शमशेर बहादुर बसपा से थे और 54723 वोट पाकर तीसरे नंबर पर रहे थे। उस समय मतदाता संख्या थी 3,21,722 थी। इनमें से 2,10,988 वोट इन तीन नेताओं को मिले थे। बाकी 110734 वोट में अन्य प्रत्याशियों का हिस्सा था। इस बार 2022 में मतदाता संख्या बढ़कर 331871 हो चुकी है और 2017 में प्रतिद्वंदी रहकर 210988 वोट बटोरने वाले तीन नेता एक साथ एक मंच पर हैं। अंतर सिर्फ इतना कि 2017 में रनर रहे यशपाल चौधरी का निधन हो चुका है और उनकी जगह बेटे वरुण चौधरी हैं। अब सवाल यह कि क्या बाला प्रसाद अवस्थी, यशपाल चौधरी के उत्तराधिकारी वरुण और शमशेर बहादुर के पास अभी भी 2,10,988 वोट हैं? अगर ऐसा है तो यह वोट एक जगह जाएंगे और बाकी बचे 1,20,883 वोटों में भाजपा, बसपा, कांग्रेस सहित सभी को संतोष करना होगा, लेकिन परिणाम बदलता है तो धौरहरा के मतदाताओं पर से व्यक्तिवादी होने का ठप्पा हमेशा के लिए हट जाएगा। जवाब जनादेश के रूप में 10 मार्च को ही आएगा। इंतजार करिए। कभी नहीं चला उत्तराधिकार का दावा धौरहरा के मतदाताओं ने किसी नेता को भले ही कई बार विधायक बनाया लेकिन उसके बेटों को कभी नहीं अपनाया। 1962 और 1980 में तेजनारायण त्रिवेदी यहां से विधायक चुने गए, लेकिन उनके बाद कई चुनाव लड़े उनके बेटे आनंद मोहन त्रिवेदी कभी सफल नहीं हुए। इसी तरह सरस्वती प्रताप सिंह 1974, 1985, 1989 और 1996 में विधायक रहे, लेकिन उनकी पत्नी आरती सिंह और बेटे समर प्रताप सिंह हर बार चुनाव हारे। अब 2022 में दो बार विधायक रहे यशपाल चौधरी की जगह उनके बेटे वरुण हैं तो चार बार के विधायक बाला प्रसाद ने खुद चुनाव न लड़कर बेटे राजीव को आगे कर दिया है। यह बात दीगर है कि यह दोनों अब एक ही खेमे का हिस्सा हैं।

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