कुशीनगर : बीते पांच वर्षों से अस्तित्व में आने का इंतजार कर रही नई शिक्षा नीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय उसे अमलीजामा पहनाने में जुटा हुआ है। देश में शिक्षा की दुर्दशा पर दबी जुबान बोलने का कोई फायदा नहीं है। हालात बहुत बिगड़ गए हैं, दो टूक कहें तो इसके लिए स्कूल और शिक्षक दोनों जिम्मेदार हैं। उनमें जिम्मेदारी का सर्वथा अभाव रहता है।

ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पर छिटपुट प्रहार करने से काम नहीं बनेगा। यह बातें राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह ने कही। वे पनियहवा घाट पर आयोजित मां नारायणी सामाजिक कुंभ में शिरकत करने के बाद पत्रकार वार्ता कर रहे थे।

कहा कि किसी देश का भविष्य बच्चों की प्राथमिक शिक्षा पर निर्भर करता है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षण में मातृभाषा को प्राथमिकता देना होगा। इसके साथ-साथ तीन भाषाओं के फॉर्मूले को नई शिक्षा नीति-2019 के मसौदे में प्रमुखता के साथ शामिल किया गया है। नई शिक्षा नीति में 'शिक्षा का अधिकार' कानून के दायरे को व्यापक बनाया गया है।

नई व्यवस्था में 12 वीं कक्षा तक की शिक्षा के लिए लागू करने की सिफारिश की गई है। आवासीय विद्यालयों में बालिकाओं के लिए नवोदय विद्यालयों जैसी व्यवस्था का सुझाव नई नीति में है। कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय का विस्तार 12 वीं तक करने का सुझाव है। वर्ष 1986 में तैयार शिक्षा नीति में वर्ष 1992 में व्यापक संशोधन किए गए थे। बीते 28 वर्षों में दुनिया कहां-से-कहां पहुंच गई, पुरानी शिक्षा नीति से काम नहीं चलने वाला है।

Posted By: Jagran

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