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600 रुपये तक सस्ते में बिक रहे गैस सिलिंडर, एजेंसियों ने खुद घटाए रेट, जानें वजह और इसका असर

Published: Wed, 23 Sep 2026 09:57 PM (IST)

कुशीनगर में गैस सिलिंडर निर्धारित दरों से 600 रुपये तक सस्ते में बेचे जा रहे हैं, जिससे आम जनता और छोटे वितरक परेशान हैं।

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HighLights

  1. गैस सिलिंडर 600 रुपये तक सस्ते में बिक रहे।

  2. कोटा दबाव, अवैध रीफिलिंग मुख्य कारण हैं।

  3. प्रशासन की खामोशी पर गंभीर सवाल उठ रहे।

जागरण संवाददाता, कुशीनगर। जनपद में इन दिनों घरेलू व व्यावसायिक गैस सिलिंडर को लेकर एक अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिल रही है। जहां एक तरफ आम जनता अक्सर गैस सिलिंडर की आसमान छूती कीमतों से परेशान रहती है, वहीं दूसरी तरफ जिले के कई इलाकों में गैस एजेंसी संचालक और वितरक एलपीजी सिलिंडर को निर्धारित सरकारी दरों से 600 तक सस्ते में बेचने को मजबूर हैं।

पहली नजर में यह खबर किसी सरकारी राहत या भारी छूट जैसी लग सकती है, लेकिन इसके पीछे का सच गैस कारोबार में चल रही गलाकाट प्रतिस्पर्धा कोटा पूरा करने का दबाव और अवैध कमर्शियल रीफिलिंग के सिंडिकेट से जुड़ा हुआ है।

अंडरकटिंग खेल के तीन मुख्य कारण

टारगेट और कोटा पूरा करने का दबाव

गैस कंपनियों द्वारा एजेंसियों को हर महीने एक निश्चित कोटा दिया जाता है। यदि समय पर सिलिंडर का उठाव और वितरण नहीं होता, तो एजेंसियों की रेटिंग और सप्लाई चेन पर बुरा असर पड़ता है। इसी दबाव के चलते एजेंसी मालिक थोक के खरीदारों को भारी डिस्काउंट पर सिलिंडर खपाने को मजबूर हैं।

दूसरा अवैध कमर्शियल रीफिलिंग और कालाबाजारी

कुशीनगर के नगरीय और ग्रामीण इलाकों में छोटे ढाबों, होटलों और कमर्शियल संस्थानों में व्यावसायिक (19 किलोग्राम) सिलिंडर की जगह सस्ते में घरेलू (14.2 किलोग्राम) या अवैध रूप से रीफिल किए गए सिलिंडर का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। बाजार में बने रहने के लिए वितरक आपस में ही रेट घटाकर कंपटीशन कर रहे हैं।

स्थानीय वितरकों की आपसी 'प्राइस वार'

क्षेत्र में ग्राहकों और थोक खरीदारों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए अलग-अलग एजेंसियों के वितरकों के बीच रेट घटाने की होड़ लगी है। इस चक्कर में सिलिंडर अपने आधिकारिक रेट से ₹600 तक कम कीमत में बाजार में उतारा जा रहा है।

किसे फायदा और किसे नुकसा

ग्राहकों के लिए उलझन

जो आम उपभोक्ता सही प्रक्रिया से सिलिंडर की बुकिंग करा रहे हैं, उन्हें सब्सिडी और बिलिंग के तहत सरकारी दर ही चुकानी पड़ रही है। वहीं, थोक या अनऑफिशियल चैनल से खरीदने वालों को यह छूट मिल रही है, जिससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

छोटे वितरकों की कमर टूटी

इस अनैतिक रेट वॉर से छोटे वितरकों और नियम से काम करने वाली एजेंसियों के मार्जिन पर गहरा असर पड़ रहा है, जिससे उनका बिजनेस मॉडल ठप्प होने के कगार पर पहुंच गया है।

प्रशासन और विभाग की खामोशी पर सवाल

सरकारी नियमों के अनुसार एलपीजी सिलिंडर की दरें आयल मार्केटिंग कंपनियों द्वारा तय की जाती हैं और उनसे कम या अधिक दाम पर अनियमित तरीके से बिक्री करना नियमों का उल्लंघन है। कुशीनगर में 600 रुपये तक के अंतर से सिलिंडर बेचे जाने का यह मामला न सिर्फ एलपीजी वितरण प्रणाली की पोल खोलता है, बल्कि खाद्य एवं आपूर्ति विभाग और नापतोल विभाग की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

अब देखना यह होगा कि इस खबर के सामने आने के बाद जिला प्रशासन और संबंधित गैस कंपनियां इस रेट वार और अवैध रीफिलिंग सिंडिकेट पर क्या कार्रवाई करती हैं।

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