कुशीनगर : कसया क्षेत्र के गांव मठिया माधोपुर में 1839 से हो रही रामलीला सामाजिक समरसता का प्रतीक है। सांस्कृतिक धरोहर की इस परंपरा में न सिर्फ 35 फीट ऊंचा रावण का पुतला विशेष है, बल्कि इसका शरद पूर्णिमा को होने वाला दहन भी आकर्षण का केंद्र होता है। रामलीला के आयोजन में सभी धर्म व वर्ग के लोग अपनी भागीदारी निभाते हैं। बांसफोड़ रावण के पुतले के लिए बातियां बनाते हैं तो मुसलमान कलाकार उसे मूर्त रूप देते हैं। राम-सीता विवाह के आयोजन में सभी की भागीदारी रहती है।

इस वर्ष कार्तिक पंचमी को हनुमान चबूतरा बनने के बाद रामचरित मानस का पाठ शुरू हुआ। यहां के लोगों ने वर्ष 1839 में पहली बार रामलीला का मंचन भोजपुरी में किया। 1840 में रामलीला का आयोजन शुरू हो गया। लोगों को न तो खड़ी बोली आती थी और न ही वे हिदी जानते थे। गांव में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बहुत कम थी। बावजूद इसके रामलीला की शुरुआत भोजपुरी में हुई।

खड़ी बोली का हुआ प्रयोग

रामलीला में पहली बार खड़ी बोली का प्रयोग गांव के अनपढ़ कलाकार (ताड़का बनने वाले ठगई राय) ने किया। 'मार डालेंगीं, काट डालेंगीं' बोलकर सबको हैरत में डाल दिया था। तब मजाक के रूप में लिया गया यह वाक्य ही रामलीला को हिदी में शुरू करने की प्रेरणा बनी।

अयोध्या बाबा ने डाली नींव

79 वर्षीय डा. इंद्रजीत मिश्र, 78 वर्षीय पंडित नंदकिशोर दूबे बताते हैं कि अयोध्या से रामलीला देख गांव लौटे पंडित अयोध्या मिश्र ने श्रीरामचरित मानस का पाठ शुरू कराया। खिचड़ी बाबा उर्फ सुरुजन मिश्र ने रामलीला शुरू कराई। राम-सीता विवाह में गांव महिलाओं की भागीदारी रहती है। मंगल गीत गाने के लिए इनमें आज भी उत्साह है।

अब बन चुका है राम-जानकी का मंदिर

-ग्रामीणों और क्षेत्रीय लोगों के सहयोग से अब श्रीरामलीला मैदान में राम-जानकी मंदिर का निर्माण हो चुका है। सत्यम, शिवम, सुंदरम के नाम से स्थापित मंदिर में श्रीराम दरबार के अलावा भगवान शिव और माता दुर्गा की मूर्तियां भी स्थापित हैं। दशहरा, शिवरात्रि और नवरात्र के मौके पर यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। यहां आयोजित होने वाला दो दिवसीय मेला और उसमें दंगल क्षेत्रीय लोगों के आकर्षण का केंद्र होता है।

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