जागरण संवाददाता, कुशीनगर :

पर्यावरण खतरे में है। पूरे विश्व में नदी, तालाब, पेड़, पौधों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण पर चर्चा हो रही है। ऐसे में यहां बुद्ध कालीन हिरण्यावती नदी के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा हो गया है। यदि अगर ऐतिहासिक नदी को बचाने के प्रयास नहीं किए गए तो इसका अस्तित्व भी मिट सकता है।

लगभग 2500 वर्ष पूर्व बुद्ध ने हिरण्यवती नदी का जल पीकर भिक्षुओं को अंतिम उपदेश देने के बाद महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। उनका दाह संस्कार मल्लों ने चक्रवर्ती सम्राट की भांति इसी नदी के तट पर रामाभार में किया था। उस समय नदी विशाल थी यही कारण है कि भिक्षु महाकश्यप जब बिहार से यहां पहुंचे तो शाम होने के कारण नदी पार नहीं कर सके और प्रात: काल नदी पार करके रामाभार पहुंचे तब जाकर बुद्ध का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।

हिरण्यवती का पानी बौद्धों के लिए काफी पवित्र है। पर्यटक यहां से पानी ले जाकर अपने पूजा घरों में रखते हैं। कुछ माह पूर्व तत्कालीन डीएम रिग्जियान सैम्फिल ने रामाभार स्तूप के निकट बुद्ध घाट का निर्माण करवाया था जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। हिरण्यवती के जीर्णोद्धार के लिए डा. एसएन सुब्बा राव सहित अनेक लोगों ने गंभीर प्रयास किए। इसके अतिरिक्त शासन ने भी ऐतिहासिक नदी के जीर्णोद्धार के लिए अनेक योजनाओं की घोषणा की किंतु स्थिति यह है कि हिरण्यवती आज अपने बदहाली पर आंसू बहा रही हैं। जरूरत है कि शासन इस ऐतिहासिक नदी के जीर्णोद्धार एवं विकास हेतु योजनाबद्ध तरीके से कार्य करे नहीं तो हिरण्यवती नदी का अस्तित्व ही मिट जाएगा।

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