नीरज सिह, कौशांबी

कुछ करने की इच्छा हो तो आपका पेशा रोड़ा नहीं बन सकता। आप पेशे में रहते हुए भी अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं। लोगों के बीच पहुंचकर उनको जागरूक कर सकते हैं। मृदा वैज्ञानिक डा. मनोज सिंह किसानों के बीच पहुंचकर उनको जल संरक्षण के लिए प्रेरित करते हैं। इतना ही नहीं अपने दूरदर्शन व किसान चैनल के साथ ही अन्य माध्यमों से वह जल संरक्षण के लिए किसानों को प्रेरित करते रहते हैं। उन्होंने अब खुल को जल संरक्षण से जोड़ लिया है। उनकी सोच है कि सबको पानी तभी मिलेगा जब सब मिलकर जल संचय करेंगे।

कृषि विज्ञान केंद्र कौशांबी में मृदा वैज्ञानिक के तौर पर तैनात डा. मनोज सिंह ने खुद को जल संरक्षण अभियान से जोड़ रखा है। डा. मनोज की मानें तो उनके पिता प्रयागराज में नौकरी करते रहे। उनका बचपन का परिवेश तो शहरी था, लेकिन इंटर के बाद वह कृषि से स्नातक की पढ़ाई करने आगरा गए। वहां पर पढ़ाई के दौरान ही उनको एनएसएस से जुड़ने का मौका मिला। अपने प्रयोगात्मक शिक्षा व एनएसएस के कैंप में उनको गांव जाने का अवसर मिला। शिक्षा के दौरान ही उन्होने लोगों की पानी से जुड़ी समस्या देखी तो वह अंदर से हिल गए। एक एक बाल्टी पानी के लिए लोग कई किमी तक का सफर करते थे। उनकी इस समस्या को देखकर छात्र जीवन से ही वह जल संरक्षण के अभियान से जुड़ गए। भूमि सुधार विभाग में इनको पहली नौकरी मिली। इस दौरान इन्होंने किसानों को भूमि सुधार से जुड़े कार्यक्रमों के दौरान पानी बचाने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद दूसरी नौकरी कृषि विज्ञान केंद्र कौशांबी में मृदा विज्ञानी के रूप में शुरू की। डा. मनोज ने बताया कि पूरे साल 60 से 80 कार्यशाला होती है। हर कार्यशाला में 50 से 100 किसान शामिल होते हैं। इस दौरान उनको खेती से जुड़ी जानकारी देने के साथ बारिश के पानी का संचय, ड्रिप सिचाई, मेड़बंदी कर पानी की बचत, रेनगन से सिचाई आदि के माध्यम से पानी बचाने के लिए प्रेरित किया। डा. मनोज सिंह ने बताया कि पूरे साल भर में उनको 10 बार दूरदर्शन व किसान चैनल में कार्यक्रम करने का अवसर मिला। इस दौरान वह किसानों को चैनल के माध्यम से पानी बचाने के लिए प्रेरित करते रहे। इसके परिणाम भी बेहतर मिले हैं। बताया कि चायल में करीब दस किसान ऐसे हैं जो उनके लगातार संपर्क में है। वह ड्रिप सिचाई व बागवानी में पौधे के निकट एक घड़ा दबाकर उसके माध्यम से सिचाई कर रहे हैं। यह एक बेहतर पहल है। इससे पानी की बचत के साथ ही बेहतर खेती होती है। अब डा. मनोज कम पानी वाले धान की फसल की रोपाई किसान करें। इसके लिए लगातार अभियान चला रहे हैं।

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