करारी, कौशांबी : रामलीला के मंचन में हनुमान-रावण संवाद और लंका दहन के साथ समाज की नीति, व्यवस्था एवं मर्यादाओं का मार्मिक दर्शन कराकर वर्तमान पीढ़ी को अतीत से गौरवान्वित किया गया।

रामलीला के मंच से दर्शाया गया कि कभी निराश नहीं होना चाहिए। न ही संकट में घबराना चाहिए। माता सीता ने रावण की अशोक वाटिका में राक्षसी की सुरक्षा में रहते हुए भी अपना धैर्य नहीं खोया। रावण को मुंहतोड़ जवाब देकर पतिव्रता होने का परिचय दिया। हनुमान ने लंका जाकर माता सीता को भगवान श्रीराम की मुद्रिका देकर उनके साहस को संबल प्रदान किया तथा माता सीता की शंका का समाधान करने के लिए ही हनुमान ने अशोक वाटिका को उजाड़ा। रावण पुत्र अक्षय कुमार का वध किया लेकिन मेघनाथ की ब्रह्म फांस में बंधकर जब वे रावण दरबार में पहुंचे तब भी श्रीराम की शक्ति का ही वर्णन किया। त्रेता युग की मर्यादाओं एवं युद्ध नीति का दर्शन कराते हुए श्री रामलीला कमेटी ने दिखाया कि रावण चाहे कितना ही बड़ा अहंकारी और अत्याचारी रहा हो, लेकिन अशोक वाटिका में माता सीता से मिलने कभी अकेला नहीं गया। रामदूत हनुमान को अपने पुत्र का हत्यारा होने के बाद भी न तो मारा न ही कारागार में डाला बल्कि लंका में आग लगाने के बाद लंका से जाने दिया। उसका एकमात्र उद्देश्य भगवान श्रीराम के हाथों अपनी मुक्ति थी। इसीलिए न तो उसने किसी का परामर्श माना और न ही किसी परिजन की मृत्यु पर दु:ख व्यक्त किया।

Posted By: Jagran

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