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कौशांबी टोल प्लाजा अग्निकांड : मौत सामने दिखी तो दांव पर लगा दी जिंदगी, छत से कूदकर बचाई जान

By Adarsh Kumar Srivastava Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Fri, 26 Jun 2026 04:11 PM (IST)

कौशांबी के सिहोरी टोल प्लाजा पर एलपीजी टैंकर टकराने से भीषण आग लग गई, जिससे कंट्रोल रूम तक लपटें पहुंच ...और पढ़ें

कौशांबी के सिहोरी टोल प्लाजा पर हुए भीषण अग्निकांड की घटना में घायल सत्येंद्र। जागरण

कौशांबी के सिहोरी टोल प्लाजा पर हुए भीषण अग्निकांड की घटना में घायल सत्येंद्र। जागरण

HighLights

  1.  लपटें देख स्टाफ रूम में आराम कर रहे कर्मियों में मची भगदड़

  2. एलपीजी से भरा टैंकर टोल बूथ से टकराया, भड़क उठी आग

संसू, जागरण, कोखराज (कौशांबी)। सिहोरी टोल प्लाजा पर शुक्रवार भोर में हुए भीषण अग्निकांड में जिंदगी व मौत के बीच सीधा संघर्ष दिखा। टोल बूथ में एलपीजी से भरा टैंकर टकराने के बाद भड़की आग कंट्रोल रूम तक पहुंच गई थी। वहां स्टाफ रूम में सो रहे कर्मी एक धमाके के बाद नींद से जगे व जान बचाने के लिए छत से नीचे कूदने लगे। चिंता हाथ-पैर के टूटने की नहीं, बल्कि किसी तरह जिंदा बचने की थी।

दिल्ली-कोलकाता नेशनल हाईवे पर कौशांबी जनपद में कोखराज क्षेत्र के सिहोरी स्थित गंगा नदी के पुल से ठीक पहले टोल प्लाजा बनाया गया है। 10 लेन वाले टोल प्लाजा के ठीक बगल में टोल कंपनी का प्रशासनिक भवन व कंट्रोल रूम है। टोल में मैनेजर अनूप पांडेय सहित करीब 50 लोगों का स्टाफ है। जिसमें से 10 कर्मी बूथ पर रहते हैं, बाकी कंट्रोल रूम के ठीक बगल स्टाफ रूम में रहते हैं।

घटना के चश्मदीद टोल कर्मी रविंद्र पांडेय ने बताया कि वह साथी कर्मियों के साथ कंट्रोल रूम के दो मंजिला भवन में सो रहे थे। भवन की बाहरी दीवार में कांच लगाया गया था। शुक्रवार की भोर करीब 5.45 बजे लेन संख्या एक व दो में लगे ड्यूटी कर्मी दरवाजा पीटने लगे। वह लोग कुछ समझ पाते, तभी जोर की आवाज के साथ लपटें, धुएं के गुबार के साथ कांच तोड़ते हुए कमरे तक फैल गई।

इसके बाद कुछ नहीं सूझा। बाहर हर तरफ आग व धुआं था। एक पल लगा कि वह जिंदा नहीं बचेगा। इसे लेकर उसने जिंदगी दांव पर लगाई व लपटों के बीच दूसरी मंजिल से नीचे छलांग लगा दी। घटना में रविंद्र के पैरों में काफी चोट है। वहीं, सत्येंद्र कुमार व महेंद्र मौर्य भी ऐसे ही अपनी जान बचाने में कामयाब हुए हैं।

छत से नीचे कूदने के कारण वह जख्मी तो हुए लेकिन दर्द मानों गायब था। मौत को करीब से देख वह लोग घटना के बाबत सिर्फ टूटे-फूटे शब्द ही जुबां से निकाल पा रहे थे। घायल कर्मी कभी फोन पर नंबर डायल करने लगते तो कभी हूटर बजाती एंबुलेंस को निहारते। मानों वह अपनी कुशलता की खबर दूसरों तक पहुंचा रहे थे या फिर फोन घटना में झुलसे साथियों का हाल जानने के लिए किया जा रहा था।

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