जागरण संवाददाता कौशांबी : जिला शिक्षा माफिया का गढ़ माना जाता है। जिले के हर गांव व कस्बे में कोई न कोई विद्यालय है। इसके बाद भी यहां शिक्षा व्यवस्था अधूरी सी लगती है। इसका कारण रहा कि निजी विद्यालयों के अतिरिक्त यहां सरकारी संस्थान नहीं है। ऐसे में स्थानीय लोग लंबे समय से केंद्रीय विद्यालय खुलने का इंतजार कर रहे हैं। करीब सात सालों से केंद्रीय विद्यालय के लिए कवायद चल रही है लेकिन अब तक वह भूमि ही नहीं खोजी जा सकी, जहां केंद्रीय विद्यालय का निर्माण हो सके।

किसी जिले के विकास की रीढ़ वहां की शिक्षा व्यवस्था को माना जाता है। कौशांबी में कहने को तो बहुत विद्यालय हैं। हर गांव में कोई न कोई विद्यालय संचालित है। इसके बाद भी यहां बेहतर विद्यालयों का अभाव है। कौशांबी के लोग शिक्षा के लिए आज भी प्रयागराज पर आश्रित है। यहां के तमाम विद्यार्थी प्रयागराज में किराए का कमरा लेकर शिक्षा ग्रहण करते हैं। परिवार भी शिक्षा के लिए प्रयागराज में बच्चों के साथ रहते हैं। ऐसे में जिले की शिक्षा व्यवस्था के लिए केंद्रीय विद्यालय की मांग बढ़ी थी। करीब सात साल पहले इसके लिए जिला स्तर पर मंथन हुआ। सांसद विनोद सोनकर समेत अन्य जन प्रतिनिधियों ने जोर लगाया। इसके बाद प्रशासन ने कादीपर मेला बाग के पास भूमि चिह्नित कर केंद्रीय विद्यालय आयोग को जानकारी दी। उस जमीन को बाद में किसी कारण से मेडिकल कालेज के निर्माण के लिए दे दी गई। दोबारा टेवां में भूमि चिह्नित हुई, जो कृषि विभाग की निकली। इन दोनों स्थानों पर केंद्रीय विद्यालय बनना संभव नहीं हुआ तो सिराथू की ओर भूमि की पड़ताल हुई। जिला प्रशासन ने तहसील के निकट से गुजरे नहर मार्ग पर एक भूमि चिह्नित की। इसके बाद केंद्रीय विद्यालय आयोग की टीम ने भूमि को देखा तो वहां विद्यालय के लिए उचित नहीं लगी। लिहाजा, केंद्रीय विद्यालय निर्माण का मामला ठंडे बस्ते में चला गया। लोगों को उम्मीद है कि नई सरकार के गठन के बाद विद्यालय बनने की पहल हो सकती है। फिलहाल वर्तमान में यह बड़ी चुनौती है।

कोट--

जिला विद्यालय निरीक्षक एसके मिश्र ने बताया कि अब तक तीन स्थानों पर भूमि चिह्नित हुई है। जिससे स्वीकृत नहीं किया गया। अब भूमि को चिह्नित करने की प्रक्रिया फिलहाल स्थगित है। चुनाव बाद विचार होगा।

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