जागरण संवाददाता, कासगंज : वे कुदरत की कमी को तो पूरा नहीं कर सकते लेकिन अपने हौसलों से खुद के 'दिव्य' होने का अहसास करा देते हैं। साथ ही सिद्ध करते हैं कि दिव्यांगता का अर्थ निर्भरता नहीं होती। हम बात कर रहे हैं शहर के ऐसे दिव्यांग बच्चों की, जिनकी प्रतिभा और हिम्मत देख अच्छे-अच्छे दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं।

मूक बधिर स्कूल में यूं तो कई दिव्यांग बच्चे हैं, लेकिन इनमें से कुछ ऐसे हैं जो खास हैं। शिक्षकों के अलावा आने वाले अधिकारी व अतिथियों तक से प्रतिभा के बल पर शाबासी पाते हैं। अमांपुर की गीता देख नहीं सकती, लेकिन ढोलक पर उसकी थाप स्वस्थ बच्चियों को पीछे छोड़ देती है। ढोलक को बजते सुनकर ही उसने यह हुनर विकसित किया है। पटियाली की सीमा भी देख नहीं सकती। मूक बधिर स्कूल में कोई भी कार्यक्रम हो, उसके लोकगीत बिना वे अधूरे रहते हैं। आवासीय स्कूल में शिक्षा पाने वाली सीमा हर कार्यक्रम में भाग लेती है तो 10 वर्षीय करीना भी गीतों को सुनाकर लोगों को झूमने पर मजबूर कर देती हैं।

गंगेश्वर कॉलोनी निवासी मुनीश के बचपन से दोनों पैर खराब हैं। इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। वे वर्तमान में ऐसे लोगों के लिए नजीर बन गए हैं जो स्वस्थ होकर भी कुछ नहीं करते। गरीबी ने पढ़ने नहीं दिया, लेकिन उन्होंने अपनी ट्राइसाइकिल को ही रोजगार का माध्यम बना लिया। शहर की एक ट्रांसपोर्ट पर आने वाले कार्टन सप्लाई करने का काम शुरू किया। इन्हें वे खुद ही लादते और उतारते हैं। प्रतिदिन चार से पांच चक्कर लगाने वाला मुनीश कहते हैं किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

Posted By: Jagran

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