जागरण संवाददाता, कानपुर : सोशल मीडिया के युग में जन्मदिन एचबीडी व मृत्यु आरआइपी बनकर रह गए हैं। हां साथ ही कुछ फूलों के गुलदस्ते और प्रार्थना से जुड़े दो हाथ। इमोशन होते हुए भी जैसे सभी मानवीय भावनाओं का सौंदर्यीकरण कर इसे उपहास बना रहे हैं। जिस निर्भाव मन से हम एचबीडी और आरआइपी लिखकर आगे स्क्रॉल कर देते हैं, किसी दिन हम भी ऐसे ही लोगों के ग्रुप से लेफ्ट हो जाएंगे। हां हमें गुलदस्ते और नमस्ते ढेर सारे मिलेंगे.. यह किसी एक के लिए नहीं बल्कि सब उन लोगों के लिए सत्य है जो सोशल मीडिया पर कोई खुशी या गम के संदेश पर ऐसा कर रहे है। फेसबुक पर आइपीएस सुरेंद्र दास की मौत की खबर वायरल होते ही आइपीएस ख्याति गर्ग ने यह पोस्ट की, जिसके बाद उन्होंने भी भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

ऐसा शायद ही कोई उनका साथी या जानने वाला होगा जिसने पोस्ट न की हो या किसी पोस्ट पर अपनी संवेदना व्यक्त न की हो। उनकी असमय मृत्यु से विभाग में शोक की लहर है। दूसरी तरफ भारत बंद के चलते शहर के पुलिस कर्मियों की छुंट्टी स्थगित होने से कोई भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाया।

---------------------

कौन गलत था कौन सही दुनिया करे विचार..

कौन गलत था, कौन सही था दुनिया करे विचार, वह तो मानुस बहुद दुखी था जो छोड़ चला संसार.. यह सीओ कोतवाली अजय कुमार के लिखे शब्द आइपीएस दास के सुसाइड पर सही बैठ रहे हैं। कोई उनकी पत्नी, कोई उन्हें तो कोई उनके आसपास रहने वाले रिश्तेदारों को दोषी ठहरा रहे है जबकि सही क्या है यह जांच का विषय है। दिवंगत के परिजन पत्नी व ससुराल वालों पर सुसाइड के लिए प्रेरित करने जैसे तमाम आरोप लगा रहे हैं वहीं उनके ससुर इसे मनगढ़ंत और वक्त आने पर असलियत सामने लाने का दावा कर रहे हैं। हो कुछ भी, लेकिन एक अच्छे इंसान की मौत बहस का मुद्दा बन गई। जबकि जो हुआ गलत हुआ और जो किया वह बहुत ही गलत किया। यह बाद परिजन से लेकर उनके जानने वाला हर शख्स कह रहा है।

Posted By: Jagran