कानपुर, जेएनएन। संक्रमण की शुरुआत पिछले साल हुई थी। वह दौर था, जब मरीज के साथ खुद डॉक्टर भी डरे हुए थे। बीमारी कितनी घातक है, कोई नहीं जानता था। हर किसी के जेहन में बस एक ही बात, खुद की जिंदगी बचाओ। इन विपरीत परिस्थितियों में भी कई ऐसे लोग थे, जिन्होंने अपनी जिंदगी की परवाह नहीं की। डर और खौफ के साए में सेवा के जज्बे को जिंदा रखा और जीवन की आस छोड़ चुके कई मरीजों को जिंदगी दी। हम बात कर रहे हैं हृदय रोग संस्थान (काॢडयोलॉजी) की सीनियर नॄसग ऑफिसर ऊषा निगम की, जिन्होंने पिछले वर्ष कोरोना संक्रमण काल में रोगियों की सेवा की। पॉजिटिव भी हुईं, पर निगेटिव रिपोर्ट आते ही ड्यूटी ज्वाइन कर ली। इस बार भी अपने मिशन पर खरी उतर रही हैं। उनका कहना है कि जब कोई मरीज ठीक होकर घर जाता है तो बहुत खुशी मिलती है।

धैर्य से साथ दिया काम को अंजाम : ऊषा बताती हैं कि शुरुआत में वह और उनके अन्य स्टाफ काफी डरे थे। समझ ही नहीं पा रहे थे क्या करें और क्या न करें। धैर्य के साथ अपना काम अंजाम देना शुरू किया। उसी दौरान संस्थान में पॉजिटिव केस का पता चला। कुछ डॉक्टर व स्टाफ संक्रमित हुए। कुछ दिन के लिए संस्थान बंद हुआ। इमरजेंसी सेवाएं जारी थीं। उन्होंने भगवान का नाम लिया और ड्यूटी ज्वाइन की। वह मौजूदा समय में कैथ लैब में हैं। यहां रोगियों को पेसमेकर लगता है। दिल में ब्लॉकेज खोला जाता है। उन्होंने बताया कि फतेहपुर के जिला अस्पताल में छह महीने काम करने के बाद 1987 में उन्हेंं ऑपरेशन थियेटर में भेजा गया। यहां उन्होंने स्टाफ नर्स के तौर पर 22 साल तक काम किया। 2007 में स्वीडन से आई डॉक्टरों की टीम ने लगातार कई घंटे काम किया था। उन्होंने भी 18 से 20 घंटे तक ऑपरेशन में हिस्सा लिया। इस पर उन्हेंं सम्मानित किया गया।

दस साल के मासूम की बचाई जान : वह बताती हैं कि 1998 में 10 साल के बच्चे के दिल में छेद था। उसे गंभीर हालत में लाया गया था। डॉ. राकेश वर्मा और उनकी टीम ने मिलकर उसकी जान बचाई थी। उस दौरान यह सबसे मुश्किल ऑपरेशन में से एक था। इस बार चूंकि संक्रमण बेहद गंभीर है इसलिए डेथ रेट कुछ बढ़ा है। वह कहती हैं कि इस बार जिम्मेदारी बड़ी है। पहले काम के घंटे तय होते थे, लेकिन अब दिन रात सब एक हो गए हैं।

 

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