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यूपीसीडा भर्ती घोटाला: 90 पदों के लिए मांगे आवेदन, 108 को दे दी फर्जी प्रमाण पत्रों पर नौकरी

Published: Fri, 09 Oct 2026 09:19 AM (IST)

यूपीसीडा में बसपा सरकार के दौरान 2008-09 में हुई बैकलाग भर्ती का विवाद 15 साल बाद भी जारी है, जिसमें ...और पढ़ें

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HighLights

  1. 15 साल पुराना यूपीसीडा भर्ती घोटाला फिर चर्चा में।

  2. 90 पदों पर 108 नियुक्तियां, कई प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए।

  3. कानपुर विजिलेंस ने अब मुकदमा दर्ज कर जांच तेज की।

जागरण संवाददाता, कानपुर। उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआइडीसी) वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) में बसपा सरकार में वर्ष 2008-09 के दौरान हुई बैकलाग भर्ती का विवाद 15 साल बाद भी खत्म नहीं हुआ। दैनिक जागरण ने वर्ष 2011 में भर्ती में हुए फर्जीवाड़े का राजफाश किया था। इसके बाद अब तक करीब 33 जांच हो चुकी हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर महज सात अधिकारी-कर्मचारी ही बर्खास्त किए जा सके।

इनमें से दो की न्यायालय से बहाली भी हो चुकी है। अगस्त 2022 में शासन ने मामले की जांच विजिलेंस को सौंपी थी। करीब चार वर्ष की जांच के बाद अब कानपुर विजिलेंस ने मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई आगे बढ़ाई है।

जांच में सामने आया था कि 90 स्वीकृत पदों के सापेक्ष 108 पदों पर नियुक्तियां कर दी गईं। जांच में कई के अनुभव और शैक्षिक प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए थे। वहीं क्रीमी लेयर में आने वाले करीब आधा दर्जन अभ्यर्थियों ने भी आरक्षण का लाभ हासिल किया। भर्ती प्रक्रिया में तत्कालीन जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और बिचौलियों के सिंडीकेट की भूमिका के आरोप भी जांच में सामने आए थे।

मामले की पहली जांच वर्ष 2017 में तत्कालीन श्रमायुक्त रणवीर प्रसाद ने की थी। शासन को भेजी गई रिपोर्ट में 12 अधिकारियों के प्रमाण पत्र फर्जी बताए गए थे। रिपोर्ट में इसे गंभीर आपराधिक मामला बताते हुए कार्रवाई की संस्तुति की गई थी। इसके बाद कई स्तर पर जांच हुई। सात कमिश्नर व कमिश्नर स्तर के अधिकारियों, दो प्रमुख सचिव और तीन विशेष सचिव स्तर के अधिकारियों ने अलग-अलग जांच कर रिपोर्ट शासन को भेजी।

पूर्व कानपुर मंडलायुक्त की जांच में भी दोषी पाए गए लोगों के विरुद्ध बर्खास्तगी की संस्तुति की गई थी। इसके बावजूद कई आरोपित अधिकारी और कर्मचारी लंबे समय तक निगम में महत्वपूर्ण पदों पर बने रहे। अलग-अलग जांचों में संलिप्त लोगों की सूची शासन को भेजी जाती रही, लेकिन कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी।

जांच की फाइल घूमती रही, हर कुछ माह में नई जांच
यूपीएसआइडीसी में भर्ती घोटाले की जांच का सिलसिला 15 सालों से लगातार चलता आ रहा है। कभी मंडलायुक्त स्तर पर तो कभी शासन के अधिकारियों के स्तर पर जांच हुई। आरोप है कि हर कुछ समय बाद नई जांच बैठती रही, लेकिन मूल सवालों पर कार्रवाई नहीं हो सकी। करीब 31 बार संलिप्त अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची शासन को भेजी गई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल कागजी घोड़े दौड़ते रहे।

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जिस समय भर्ती हुई थी, उस दौरान एसके वर्मा प्रबंध निदेशक और तपेंद्र प्रसाद संयुक्त प्रबंध निदेशक के पद पर तैनात थे। बसपा सरकार के कद्दावर मंत्री रहे तत्कालीन चेयरमैन बाबू सिंह कुशवाहा सहित तत्कालीन सरकार के कई मंत्रियों और विधायकों के रिश्तेदारों को नियुक्ति मिलने के आरोप लगे थे। एक मंत्री के बेटे ने प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद जांच शुरू होने पर पद से इस्तीफा देकर खुद को बचाने के प्रयास में सफल रहे थे। हालांकि अभी भी मंत्रियों और नेताओं के कई रिश्तेदार कार्यरत हैं।

अब विजिलेंस की कार्रवाई से करीब डेढ़ दशक पुराने इस भर्ती प्रकरण में एक बार फिर उम्मीद जगी है कि फर्जी प्रमाण पत्र, स्वीकृत पदों से अधिक नियुक्ति, आरक्षण में अनियमितता और कथित सिफारिशों की परतें खुलेंगी।

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