कानपुर, [चुनाव डेस्क]। आसपास के जिलों के लिए कानपुर उम्मीदों का शहर है। कारोबार के लिए माल हो या उच्च शिक्षा और नौकरी, सारी उम्मीद कानपुर आकर पूरी होती है। इसी सिलसिले में रोजाना आने-जाने का जरिया बनती है ट्रेन। कानपुर से फतेहपुर के बीच रोजाना लगभग 500 यात्री आवागमन करते हैं। चुनाव का समय है तो सफर चुनावी चर्चा करने में कट रहा है। सरकार के कामों की चर्चा है तो महंगाई और निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की भी। केंद्र-प्रदेश स्तर के मुद्दे भी उछल रहे। क्या हो रही चर्चा, बता रहे दिवाकर मिश्र...

कानपुर से गोरखपुर के बीच चलने वाली चौरीचौरा एक्सप्रेस अनवरगंज स्टेशन से निर्धारित शाम 4.40 बजे चल देती है। सेंट्रल स्टेशन पहुंचते-पहुंचते पांच बज जाते हैं। अब तक खाली ट्रेन में बड़ी संख्या में रोजाना चलने वाली सवारियां एक साथ चढ़ती हैं। ट्रेन पांच मिनट देरी से चली तो चर्चा का विषय राजनीति होना ही है। चंदारी निकलते ही उत्तर प्रदेश पात्रता परीक्षा (टीईटी) देकर कानपुर से लौट रहे खागा के सुशील कुमार अपने साथियों से बोले, जेल में बंद किसी शख्स को पार्टियां टिकट क्यों दे देती हैं। जब कोई जेल में बंद है तो सीधी सी बात है कि उसने कुछ अपराध किया है।

उसे चुनाव लड़ने का अधिकार ही नहीं होना चाहिए। सबने उनकी हां में हां मिलाई। बिटिया को ससुराल छोड़कर आ रहे मौहार के रामपाल बोले, ‘सरकार कउनौ आवै, बस महंगाई कम होय औ बिजली समय से मिलै। अब बिजली ठीक आवत है। पहिले तौ रात म ताकै क परत रहै कि कब बिजली आई औ कब ट्यूबवेल चली। ट्रांसफार्मर बिगड़ जात है तो जल्दी बदल जात है, लेकिन बिजली विभाग के काल सेंटर वाले गड़बड़ करत हैं। काम होय न होय, बता देत हैं कि तुम्हार काम हुइ गा।’ बगल वाली सीट पर बैठे सिराथू के कपड़ा कारोबारी कैलाश चंद्र कानपुर से खरीदारी कर लौट रहे थे और बड़ी तल्लीनता से चुनावी चर्चा सुन रहे थे। मौका मिला तो बोल पड़े, भइया छोटा व्यापारी परेशान है।

कोरोना ने सब बिगाड़ दिया। बाजार में सन्नाटा रहता है। फतेहपुर में बर्तन की दुकान चलाने वाले रामबरन ने उनका साथ दिया। बोले, पिछली बार तो हालत खराब रही, लेकिन य बार कुछ ठीक है। चौडगरा में प्लास्टिक के सामान की दुकान रखे रामनरेश बोले, चार महीना हुइ गए दुकान खोले। पुरानै समान अब तक नहीं बिका। इतने में फतेहपुर के सिविल लाइंस निवासी छात्र विनय बोले, न कुछ महंगा है, न कुछ बिगड़ा है। गांव में सरकार अनाज बांट रही।

महंगी-महंगी गाड़ियों के शोरूम में लंबी-लंबी वेटिंग है। अगर कमाई घटी होती तो कोरोना काल में इतनी गाड़ियां कैसे बिकतीं? ट्रेन बिंदकी रोड स्टेशन से आगे बढ़ी तो अस्पताल से पत्नी की जांच रिपोर्ट लेकर लौट रहे शांतिनगर के सुरेश अवस्थी को बोलने का मौका मिला-‘ सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार बहुत है। सरकार काम कर रही, लेकिन निचले स्तर पर बिना पैसा दिए कोई काम नहीं होता।’ जवाब में बहुतों ने सहमति जताई और फिर तर्को का सिलसिला चलता रहा। ट्रेन फतेहपुर स्टेशन पहुंची तो लोग उतरने की तैयारी में जुट गए।

Edited By: Abhishek Agnihotri