जागरण संवाददाता, कानपुर : पेचबाग स्थित चमड़ा मंडी का वजूद अब खतरे में है। देश की तीन चुनिंदा चमड़ा मंडियों में पहले स्थान पर रहने वाली यह मंडी धीरे-धीरे रेडीमेट मार्केट में तब्दील होती जा रही है। इसका बड़ा कारण टेनरियों के भविष्य पर अनिश्चतता का खतरा मंडराना है। विदेशी में कच्चे चमड़े का निर्यात कम हो गया है, क्योंकि इसकी आपूर्ति ही नहीं हो पा रही है।

पेचबाग में दो सौ वर्ष पुरानी कच्चे चमड़े की मंडी है। यहां से पाकिस्तान, बांगलादेश समेत कई देशों में कच्चे चमड़े की आपूर्ति की जाती थी, लेकिन अब निर्यात बंद हो चुका है। मंडी में कभी 600 से अधिक कच्चे चमड़े के गोदाम थे लेकिन अब 60 से 70 गोदाम ही बचे हैं। इसकी बड़ी वजह है टेनरियों की बंदी। पहले जाजमऊ में चार सौ से अधिक टेनरियां थीं अब सिर्फ 249 टेनरियां बची हैं। शेष टेनरियां विभिन्न कारणों से बंद हो गई। ऐसे में चमड़े की मांग घटी और विभिन्न शहरों से मंडी में चमड़ा खरीदकर लाने वाले कारोबारियों ने भी कारोबार समेटना शुरू कर दिया। अब कुंभ के दौरान तीन माह के लिए टेनरियां बंद की जानी हैं, लेकिन इससे पहले ही वाजिदपुर के ट्रीटमेंट प्लांट में आई खराबी के कारण सभी टेनरियों को बंद कर दिया गया। ऐसे में चमड़े की आपूर्ति पूरी तरह से ठप हो गई।

हाइड मर्चेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हाजी अफजाल अहमद का कहना है कि बार- बार टेनरियों को बंद करने से चमड़े की मांग घट जाती है। इस वजह से कारोबार प्रभावित होता है। यही वजह है कि मंडी में चमड़े का कारोबार कम होता जा रहा है। बमुश्किल 60 से 70 कारोबारी बचे हैं। इस मंडी में प्रतिदिन 500 से 600 ट्रक माल आता था, लेकिन अब सप्ताह में भी बमुश्किल 15 से 20 ट्रक चमड़ा आता है।

- मोहम्मद अनवार , कारोबारी एक दौर था जब यहां हजारों लोग ट्रकों से चमड़ा उतारने और लादने का कार्य करते थे। मांग घटी तो रोजगार के अवसर भी कम हो गए।

-अनवर कमाल, कारोबारी पांच किमी में ये मंडी फैली थी लेकिन ये मंडी रेडीमेड मार्केट में तब्दील हो रही है। जल्द ही कई और लोग कारोबार समेट लेंगे।

-कामिल अंसारी, कारोबारी यहां पहले साल में अरबों रुपये का कारोबार होता था और कारोबारी करोड़ों रुपये टैक्स देते थे।

- अब्दुल हक, कारोबारी नगर पंचायत के माध्यम से मृत जानवरों का ठेका होता है लेकिन लोग डर के मारे इस ठेके भी नहीं ले रहे हैं।

- मोहम्मद अहसान हजारी , कारोबारी विदेशी कारोबारी अरबों रुपये का माल खरीदते थे और एडवांस देते थे लेकिन उनका विश्वास भी उठ गया।

- लकी रहमानी , कारोबारी

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