जितेंद्र शर्मा, कानपुर। अपनी बदहाली पर रो रहे किसानों की हालत कुछ यूं है कि किस्मत अपनी मुट्ठी में दबाए छाती पीटे जा रहे हैं। भेड़ चाल चल रहे किसान थोड़ी सी लीक बदल दें तो सफलता की बड़ी लकीर खींच सकते हैं। आइआइटी कानपुर और श्रमिक भारती संस्था द्वारा एक साल तक किए गए अध्ययन में चौंकने वाले तथ्य सामने आए हैं। पाया गया कि किसानों ने खेतों की जितनी पैदावार बढ़ाई, उतना ही नुकसान उन्हें उठाना पड़ रहा है। इन विशेषज्ञों ने ऐसे सूत्र भी सुझाए हैं, जिन्हें अपनाकर किसान लागत घटाकर ही अपनी आय कई गुना बढ़ा सकते हैं।

जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग पर काम कर रही संस्था श्रमिक भारती ने आइआइटी कानपुर के अर्थशास्त्र विभाग के साथ उत्तरप्रदेश के बाराबंकी, फतेहपुर, भदोही और चंदौली के कुल 650 किसानों पर अध्ययन किया। गेहूं और धान पर किसानों द्वारा लगाई गई लागत, पैदावार और मुनाफे के आंकलन पर एक साल तक अध्ययन किया। रिपोर्ट के परिणाम कहते हैं कि पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों ने लागत बढ़ाई, जबकि उसके सापेक्ष मुनाफा कम पैदावार करने वाले किसानों को अधिक हुआ। उन्होंने अनिवार्य लागत और फिजूल लागत पर भी अध्ययन किया है। जैविक पद्धति से लागत को कम करने भर से ही किसानों की आय दोगुनी तो हो ही सकती है।

ऐसे कम कर सकते हैं खेती का खर्च

अध्ययन में शामिल रहे श्रमिक भारती के तकनीकी सलाहकार जितेंद्र यादव बताते हैं कि किसान सिंचाई पर भी दोगुना खर्च कर रहा है। शोध में पाया गया है कि फसल को जितनी जरूरत है, उससे अधिक पानी खेत में छोड़ दिया जाता है। इससे जड़ सड़ने लगती है, जिसके इलाज में किसान और पैसा खर्च कर रसायन छिड़कते हैं। जरूरत के मुताबिक, खेत को डिजाइन कर पौधे तक पानी पहुंचाया जाए तो पौधे का विकास अधिक होगा, साथ ही सिंचाई का खर्च आधा और रसायन का शून्य हो जाएगा।

सीड बैंक से होगी बड़े खर्च की बचत

रिपोर्ट में तुलना करते हुए बीज के खर्च को भी बेजा बताया गया है। यदि गेहूं का उदाहरण लें तो किसान 50-60 रुपये प्रति किलो की कीमत पर हाइब्रिड बीज खरीदते हैं। इस फसल से बीज तैयार नहीं हो सकता और अगले साल फिर बीज खरीदना पड़ता है। गांवों में सीड बैंक खोले जा सकते हैं। यहां किसान को प्राकृतिक बीज उधार दिया जा सकता है। फसल आने पर किसान एक किलो के बदले सवा किलो लौटा दे। इस लिहाज से देखें तो 17-18 रुपये प्रति किलो का यह बीज बमुश्किल 25-26 रुपये प्रति किलो में पड़ता है। इस तरह भी सीधा- सीधा बीज का आधा खर्च बच रहा है।

जेब में होगा उर्वरक का हजारों रुपया बेतहाशा रासायनिक उर्वरक खेतों में उड़ेल रहे बाराबंकी को छोड़ भी दें तो अन्य जिलों में किसान पांच से सात हजार रुपये प्रति हेक्टेयर फर्टिलाइजर और 1500 से 3500 रुपये तक कीटनाशकों पर खर्च कर रहा है। जैविक खेती में यह खर्च शून्य हो जाएगा। घूरे की खाद के लिए गोबर का पैसा नहीं देना, कीटनाशक के लिए मट्ठा, गोमूत्र आदि पर पैसा खर्च नहीं होना। यह पैसा किसान की जेब में बचेगा और खेती की स्वस्थ होगी। 

Posted By: Sanjay Pokhriyal