कानपुर, [समीर दीक्षित]। कहते हैं कि लाेहे को लोहा ही काटता है, इस कहावत को दिमाग में बिठाकर डा. आंबेडकर इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी फार हैंडीकैप्ड (एआइटीएच) के छात्रों ने शोध किया तो गजब का वैक्टीरिया खोज निकाला है। इसकी जानकारी बायोटेक रिसर्च सोसाइटी आफ इंडिया को मिली तो वह भी हैरान रह गई और अब इस शोध को अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में प्रस्तुत करने की अनुमति दी है। इसमें सबसे खास यह है कि पेट्रो पदार्थ से उत्पन्न प्रदूषणकारी तत्वों को बैक्टीरिया ने समाप्त किया और शेष तत्व से केमिकल रहित डिटर्जेंट (बायोसर्फेक्टेंट)भी तैयार किया जा सकता है।

एआइटीएच के छात्रों का शोध

पेट्रोलियम पदार्थ केवल वायु प्रदूषण में ही इजाफे का कारण नहीं बनते बल्कि जल और जमीन पर भी दुष्प्रभाव डालते हैं। शहर में वायु प्रदूषण की बढ़ती मात्रा के साथ ही मानक से अधिक दर्ज हो रहे पानी और मृदा प्रदूषण के आंकड़े इसकी पुष्टि भी कर रहे हैं। इस प्रदूषण को थामने के लिए डा. आंबेडकर इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी फार हैंडीकैप्ड (एआइटीएच) के छात्रों ने शोध में पर्यावरण मित्र बैक्टीरिया खोज निकाले हैं। ये पेट्रोलियम पदार्थों के प्रदूषणकारी तत्वों को खत्म करने की क्षमता रखते हैं। भविष्य में इन बैक्टीरिया की मदद से पेट्रोलियम पदार्थ जनित प्रदूषण से निपटने की योजना तैयारी की जा सकती है।

बायोटेक्नोलाजी की दो छात्राओं की खोज

बायो टेक्नोलाजी विभाग की ओर से किए गए शोध में बीटेक चतुर्थ वर्ष की छात्रा शैलजा तिवारी और सृष्टि बरनवाल शामिल रहीं। शोध को बायोटेक रिसर्च सोसाइटी आफ इंडिया की ओर से जल्द होने वाली अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में प्रस्तुत किया जाएगा। कुछ दिनों पहले सोसाइटी के पास जब इस शोध की जानकारी भेजी गई तो सोसाइटी ने इसे बेहद प्रभावी माना और कांफ्रेंस में प्रस्तुति के लिए स्वीकृति दे दी।

पेट्रोल पंप और गैराज की मिट्टी में मिला बैक्टीरिया

एक कहावत है लोहा ही लोहे को काटता है, इसी सूत्र पर पेट्रोलियम पदार्थों के प्रदूषणकारी तत्वों को खत्म करने वाला बैक्टीरिया भी उसके पास पाया गया है। शैलजा ने बताया कि शोध के लिए जीटी रोड के किनारे एक पेट्रोल पंप व पास में बने गैराज के समीप से अलग-अलग मिट्टी के नमूने लिए गए। इन नमूनों से उन बैक्टीरिया को अलग किया गया, जो प्रदूषण के लिए जिम्मेदार पेट्रोलियम पदार्थों के तत्वों को खत्म कर देते हैं। शोध में सामने आया कि जो तत्व बचे, उनसे कार्बन डाइ आक्साइड व एचटूओ निकली। कार्बन डाइ आक्साइड पूरी तरह से वातावरण में घुल गई। जो तत्व बचे थे, उनसे बाय प्रोडक्ट के रूप में बायोसर्फेक्टेंट भी तैयार हो गया, जिसका उपयोग केमिकल रहित डिटर्जेंट बनाने में हो सकता है।

पहली बार आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस तकनीक का उपयोग

शैलजा ने बताया कि इस शोध के दौरान पहली बार आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस तकनीक का भी उपयोग किया। इससे यह परिणाम देखा गया कि अगर 50 मिली लीटर पेट्रोलियम पदार्थ मौजूद है तो क्या उससे 50 मिली लीटर बायोसर्फेक्टेंट भी बन सकता है? सामने आया है कि जितनी मात्रा में पेट्रोलियम पदार्थ है, उतनी मात्रा में बायोसर्फेक्टेंट बन जाएगा।

-विभाग की छात्राओं ने प्रदूषण को थामने की दिशा में कारगर शोध किया है। शोध की पूरी जानकारी बायोटेक रिसर्च सोसाइटी आफ इंडिया को भेजी गई है। -डा.मनीष सिंह, विभागाध्यक्ष, बायो टेक्नोलाजी एआइटीएच

Edited By: Abhishek Agnihotri