महोबा, [जागरण स्पेशल]। रक्षाबंधन पर जब देशभर में बहनें अपने भाई को राखी बांधती हैं, तब समूचे बुंदेलखंड में भाइयों की कलाई सूनी रहती हैं। यहां के लोग 837 साल पहले कायम इस परंपरा को गर्व के साथ निभा रहे हैं। भुजरियों के युद्ध में मिली विजय के उत्सव के रूप में दूसरे दिन ही कजली महोत्सव होता है और इसी दिन कजलियों का विसर्जन किया जाता है। तब से यहां दूसरे दिन रक्षाबंधन मनाने की परंपरा है।

ये है परंपरा के पीछे की कहानी

इतिहासकार डा. एलसी अनुरागी बताते हैं कि 837 साल पहले उरई के राजा माहिल के कहने पर महोबा के राजा परमालिदेव ने सेनापति आल्हा और ऊदल को राज्य से निष्कासित कर दिया था। इसके कुछ दिन बाद रक्षाबंधन पर राजकुमारी चंद्रावल सखियों के साथ कीरतसागर तालाब में कजलियां विसर्जन करने जा रही थीं। रास्ते में दिल्ली के राजकुमार पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी चंद्रावल का घेर लिया। पृथ्वीराज चौहान ने राजा परमालि से युद्ध रोकने के लिए बेटी चंद्रावल, पारस पथरी व नौलखा हार सौंपने की शर्त रखी। यह दास्तां स्वीकार करने जैसा था। इसलिए चंदेल शासक ने इसे ठुकरा दिया और भीषण संग्राम शुरू हो गया।

यह चंदेल शासन काल का वह दौर था जब महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्धकला का परिचय देती थीं। इतिहासकारों ने इसे भुजरियों के युद्ध की संज्ञा दी है। इसमें राजकुमारी चंद्रावल ने सखियों के साथ तलवार लेकर बहादुरी से चौहान सेना का मुकाबला किया। युद्ध में जीत मिली, लेकिन कजलियों का विसर्जन दूसरे दिन हो सका। इसी दिन रक्षापर्व दूसरे दिन मनाने की परंपरा शुरू हुई जो आज भी गर्व का अहसास कराती है।

साधुवेश में आए आल्हा ऊदल

गांव छिकहरा निवासी आल्टा सम्राट वंशगोपाल यादव बताते हैं कि आल्हा ऊदल महोबा से जा चुके थे लेकिन जब उन्हें चौहान सेना के साथ युद्ध की जानकारी मिली तो साधु वेश में महोबा लौटे और चौहान सेना के साथ युद्ध किया। इससे चौहान सेना के पैर उखड़ गए और उन्हें मात खानी पड़ी।

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Posted By: Abhishek