कानपुर, आरती तिवारी। स्वतंत्रता संग्राम में लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई जारी थी, लेकिन भगत सिंह व उनके साथियों ने भारतीय जनता को यह दिखाना चाहा कि ब्रिटिश शासन में न्याय मात्र एक ढकोसला है। इसी क्रम में स्पेशल मजिस्ट्रेट को लाहौर सेंट्रल जेल से लिखा गया एक पत्र...

11 फरवरी,1930

मिस्टर मजिस्ट्रेट,

4 फरवरी, 1930 के सिविल एंड मिलिट्री गजट में प्रकाशित आपके बयान के संबंध में यह जरूरी जान पड़ता है कि हम अपने अदालत में न आने के कारणों से आपको परिचित करवाएं, ताकि कोई गलतफहमी और गलत प्रस्तुति संभव न हो।

पहले हम यह कहना चाहेंगे कि हमने अभी तक ब्रिटिश अदालतों को बायकाट नहीं किया है। हम मि. लुइस की अदालत में जा रहे हैं, जो हमारे विरुद्ध जेल एक्ट धारा 22 के अधीन मुकदमे की सुनवाई कर रहे हैं। यह घटना 29 जनवरी को आपकी अदालत में घटित हुई थी। लाहौर षड्यंत्र केस के संबंध में यह कदम उठाने के लिए हमें विशेष परिस्थितियों ने मजबूर किया है। हम शुरू से ही महसूस करते रहे हैं कि अदालत के गलत रवैये द्वारा या जेल के अथवा अन्य अधिकारियों द्वारा हमारे अधिकारों की सीमा लांघकर हमें निरंतर जान-बूझकर परेशान किया जा रहा है ताकि हमारी पैरवी में बाधाएं डाली जा सकें। कुछ दिन पहले जमानत की दरख्वास्त में हमने अपनी तकलीफें आपके सामने रखी थीं, लेकिन उस दरख्वास्त को कुछ कानूनी नुक्तों पर नामंजूर करते हुए आपने बंदियों की तकलीफों का जिक्र करना जरूरी नहीं समझा, जिसके आधार पर जमानत की दरख्वास्त दी गई थी।

हम महसूस करते हैं कि मजिस्ट्रेट का पहला व मुख्य फर्ज यह होता है कि उसका व्यवहार निष्पक्ष व दोनों पक्षों के ऊपर उठा होना चाहिए। यहां तक कि उस दिन माननीय जस्टिस कोर्ट ने यह रूलिंग दी थी कि मजिस्ट्रेट को दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात अपने सामने रखनी चाहिए कि विचाराधीन कैदी को अपनी पैरवी के संबंध में किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े और यदि कोई मुश्किल हो तो उसे दूर करना चाहिए, अन्यथा पूरा मुकदमा एक मजाक बनकर रह जाता है, लेकिन ऐसे महत्वपूर्ण मुकदमे में मजिस्ट्रेट का व्यवहार इससे उल्टा रहा है, जिसमें 18 नवयुवकों पर गंभीर आरोपों-जैसे हत्या, डकैती और षड्यंत्र- के अधीन मुकदमा चलाया जा रहा है, जिनसे संभव है उन्हें मृत्युदंड दिया जाए। जिन प्रमुख मुद्दों पर हम आपकी अदालत में न आने के लिए विवश हुए हैं, वे इस तरह हैं-

विचाराधीन कैदियों में से अधिकांश दूर-दराज प्रांतों से हैं और सभी मध्यवर्गीय लोग हैं। ऐसी स्थिति में उनके संबंधियों द्वारा उनकी पैरवी के लिए बार-बार आना न सिर्फ बहुत मुश्किल है, बल्कि बिल्कुल असंभव है। वे अपने कुछ दोस्तों से मुलाकात करना चाहते थे, जिन्हें वे अपनी पैरवी की सभी जिम्मेदारियां सौंप सकते थे। साधारण बुद्धि का भी यही तकाजा है कि उन्हें मुलाकात करने का हक हासिल है, इस मकसद के लिए बार-बार प्रार्थना की गई, लेकिन सभी प्रार्थनाएं अनसुनी रहीं।

श्री बी. के. दत्त बंगाल के रहने वाले हैं और श्री कमलनाथ तिवारी बिहार के। दोनों अपनी-अपनी मित्र कुमारी लज्जावती व श्रीमती पार्वती से भेंट करना चाहते थे, लेकिन अदालत ने उनकी दरख्वास्त जेल-अधिकारियों को भेज दी और उन्होंने यह कहकर दरख्वास्त रद कर दी कि मुलाकात सिर्फ संबंधियों व वकीलों से ही हो सकती है। यह मामला बार-बार आपके ध्यान में लाया गया, लेकिन ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया, जिससे बंदी पैरवी के लिए आवश्यक प्रबंध कर सकते। बाद में उन्हें इनका वकालतनामा हासिल करने पर भी मुलाकात करने की आज्ञा नहीं दी गई और यहां तक कि मजिस्ट्रेट ने जेल अधिकारियों को यह लिखने से भी इन्कार कर दिया कि बंदी उसकी ओर से चलाए जा रहे मुकदमे की पैरवी के संबंध में इन मुलाकातों की मांग कर रहे थे और इस प्रकार बंदी ऊपर की अदालत में जाने योग्य नहीं रहे, लेकिन मुकदमे की सुनवाई जारी रही। इन परिस्थितियों में बंदी बिल्कुल विवश थे और उनके लिए मुकदमा मजाक से अधिक कुछ नहीं था। यह बात नोट करने योग्य है कि दूसरे बंदियों में भी अधिकांश की ओर से कोई वकील पेश नहीं हो रहा था।

मेरा कोई वकील नहीं है और न ही मैं पूरे समय के लिए किसी को वकील रख सकता हूं। मैं कुछ नुक्तों संबंधी कानूनी परामर्श चाहता हूं और एक विशेष पड़ाव पर मैं चाहता था कि वे (वकील) कार्यवाही को स्वयं देखें, ताकि अपनी राय बनाने के लिए वे बेहतर स्थिति में हों, लेकिन उन्हें अदालत में बैठने तक की जगह नहीं दी गई। हमारी पैरवी रोकने के लिए, हमें परेशान करने के लिए क्या संबंधित अधिकारियों की यह सोची-समझी चाल नहीं थी? वकील अपने सायलों (प्रार्थियों) के हितों को देखने के लिए अदालत में आता है, जो न तो स्वयं उपस्थित होते हैं और न उनका कोई प्रतिनिधि वहां होता है। इस मुकदमे की ऐसी कौन सी विशेष परिस्थितियां है, जिससे मजिस्ट्रेट वकीलों के प्रति ऐसा सख्त रवैया अपनाने पर मजबूर हुए? इस प्रकार हर उस वकील की हिम्मत तोड़ी गई जो बंदियों की मदद के लिए बुलाए जा सकते थे।

श्री अमरदास को पैरवी (डिफेंस) की कुर्सी पर बैठने की इजाजत देने की क्या तुक थी, जबकि वे किसी भी पक्ष का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे और न ही उन्होंने किसी को कानूनी परामर्श दिया। अपने मुख्तारों से मुलाकातों के संबंध में मुझे कानूनी सलाहकार से विचार-विमर्श करना था और इसी नुक्ते को लेकर हाईकोर्ट जाने के लिए उनसे कहना था, लेकिन उनके साथ इस संबंध में बात करने का मुझे कोई अवसर ही नहीं मिला। इस सबका क्या मतलब है? यह दिखाकर कि मुकदमा कानून के अनुसार चलाया जा रहा है, क्या लोगों की आंखों में धूल नहीं झोंकी जा रही? अपने बचाव का इंतजाम करने के लिए बंदियों को कोई अवसर नहीं दिया गया। इस बात के खिलाफ हम रोष प्रकट करते हैं। यदि सब कुछ उचित ढंग से नहीं किया जाता तो इस तमाशे की कोई जरूरत नहीं है। न्याय के नाम पर हम अन्याय होता नहीं देख सकते। इन परिस्थितियों में हम सभी ने सोचा कि या तो हमें अपनी जिंदगी बचाने का उचित अवसर मिलना चाहिए या हमें हमारी अनुपस्थिति में चले मुकदमे में हमारे खिलाफ दी सजाओं को भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए।

तीसरी बड़ी शिकायत अखबारों के बांटने संबंधी है। विचाराधीन कैदियों को कभी भी दंड प्राप्त कैदी नहीं माना जाना चाहिए और यह रोक उन पर तभी लगाई जा सकती है जब उनकी सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी हो। इससे अधिक इसे उचित नहीं माना जा सकता। जमानत पर रिहा न हो सकने वाले बंदी को कभी भी दंड के तौर पर कष्ट नहीं देने चाहिए। सो प्रत्येक शिक्षित विचाराधीन बंदी को कम से कम एक अखबार लेने का अधिकार है। अदालत में 'एक्जीक्यूटिव' कुछ सिद्धांतों पर हमें हर रोज एक अंग्रेजी अखबार देने के लिए सहमत हुई थी, लेकिन अधूरी चीजें, न होने से भी बुरी होती हैं। अंग्रेजी न जानने वाले बंदियों के लिए स्थानीय अखबार देने के अनुरोध व्यर्थ सिद्ध हुए। अत: स्थानीय अखबार न देने के आदेश के विरुद्ध रोष प्रकट करते हुए हम दैनिक ट्रिब्यून लौटाते रहे हैं।

इन तीन आधारों पर हमने 29 जनवरी को अदालत में आने से इन्कार करने की घोषणा की थी। ज्यों ही यह मुश्किलें दूर कर दी जाएंगी, हम बाखुशी अदालत में आएंगे।

भगत सिंह व अन्य

(यह पत्र 'भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेजÓ में संकलित किया गया है। )

Edited By: Abhishek Agnihotri