कानपुर, जागरण संवाददाता। पूरे सूबे के साथ ही कानपुर में भी मतदाताओं ने गठबंधन को सिरे से खारिज कर दिया। सपा और बसपा के रणनीतिकार दलित-मुस्लिम और पिछड़ा वोट के गठजोड़ की साझा रणनीति के भरोसे जीत का ख्वाब बुनते रहे लेकिन, उनके प्रत्याशी रामकुमार जमानत तक नहीं बचा पाए। कानपुर सीट से लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमाने की शुरुआत बसपा ने 1989 में की थी।
पहले चुनाव में बसपा प्रत्याशी शरीफ को 2.64 फीसद वोट मिले। इसके बाद अब तक बसपा जोर लगाती रही लेकिन, कभी चुनाव नहीं जीत सकी। यहां तक कि दूसरा स्थान भी नहीं मिल सका। सबसे अधिक 9.43 फीसद वोट 2009 के चुनाव में सुखदा मिश्रा ने हासिल किए थे। इसी तरह सपा ने इस सीट से सबसे पहला चुनाव 1998 में लड़ा। तब सपा प्रत्याशी सुरेंद्र मोहन अग्रवाल को 29.40 फीसद मत मिले थे, जो कि सपा के इस सीट पर अब तक के सर्वाधिक मत हैं। हालांकि वह भी दूसरे स्थान पर ही रहे। इसके बाद 2004 के चुनाव में 25.76 फीसद मत प्राप्त करने के बावजूद हाजी मुश्ताक सोलंकी तीसरे स्थान पर रहे। हार के इस दाग को धोने के लिए इस बार सपा और बसपा ने गठबंधन को प्रत्याशी बनाया।
इन दोनों दलों की साझा रणनीति सिर्फ इसी तर्क पर टिकी थी कि हमारे मिलने से दलित, मुस्लिम और पिछड़ा वोट हमें एकमुश्त मिलेगा। मगर, विशुद्ध जातिगत समीकरणों पर टिकी रणनीति को कानपुर के मतदाताओं ने पूरी तरह नकार दिया। परिणाम तो इशारा कर रहे हैं कि इस गठबंधन ने सपा और बसपा, दोनों का ही नुकसान कर दिया। सपा और बसपा को मिलाकर पिछले लोकसभा चुनाव में जहां 9.45 फीसद वोट मिला था, जबकि इस बार गठबंधन प्रत्याशी को महज 5.48 फीसद वोट ही मिल सके। महज 33451 मत पर ठिठके रामकुमार अपनी जमानत भी नहीं बचा सके।

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