जागरण संवाददाता, कानपुर : सिक्का प्रबंधन में बैंकिंग तंत्र का फेल होना कानून व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है। इसकी आशंका काफी पहले जताई गई थी जो अब सच साबित होने लगी है। बुधवार को किदवई नगर के बारादेवी क्षेत्र में जो हुआ, वह अराजकता के साथ बैंकों की मनमानी और सिक्का प्रबंधन में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के फेल होने की कहानी है। आरबीआइ ने सिक्का प्रबंधन के लिए कागजों में कई आदेश जारी किए, लेकिन हकीकत में लागू नहीं करा पाया।

नोटबंदी के दौरान नकदी संकट को दूर करने के नाम पर बैंकों ने जमकर गंदे नोट और सिक्के लोगों में बांटे थे। इनमें एक से लेकर दस रुपये तक के सिक्के थे। इसका असर दिखा और बाजार में दो सौ करोड़ रुपये से अधिक की रेजगारी इकट्ठा हो गई। समस्या तब खड़ी हुई जब बैंकों ने सिक्के लेने से मना कर दिया। कारोबारियों का करोड़ों रुपये फंस गया और कारोबार पर असर पड़ने लगा तो कारोबारियों ने सिक्का लेना बंद कर दिया। वहीं सिक्का बदलने वालों ने इस मौके को खूब भुनाया और 15 से 30 फीसद की दर पर रेजगारी बदली।

ऐसे में सिक्का प्रचलन से बाहर होने लगा। न रिटेल के बड़े दुकानदार सिक्के ले रहे और न ही सेल्समैन। ऐसे में छोटे दुकानदार सिक्कों के बोझ तले दब गए। उन्होंने भी सिक्का लेने से मना कर दिया। बारादेवी में भी यही कारण बना।

कागजों में रह गए आरबीआइ के आदेश

- 'हम सिक्का लेते हैं' का बोर्ड लगाना था बैंकों को, नहीं लगाए

- सिक्का जमा करने की व्यवस्था करनी थी, नहीं हुई

- मास्टर सरकुलर के अनुसार क्वाइन डिपाजिट मशीन होनी चाहिए, नहीं है

ये फैलाया भ्रम

- बैंकों ने आरबीआइ की भुगतान संबंधी गाइडलाइन को जमा संबंधी गाइडलाइन में बदलकर खाताधारकों और कारोबारियों को गुमराह किया। आरबीआइ का मास्टर सरकुलर कहता है कि एक बार में एक हजार रुपये तक के सिक्के जो एक रुपये से ऊपर के हों, भुगतान के लिए वैध हैं। बैंकों ने इसे जमा के लिए नियम बना दिया। आरबीआइ ने आरटीआइ में जवाब दिया कि सिक्के जमा करने के लिए आरबीआइ का स्पष्ट नियम नहीं है।

ये हो रही समस्या

एक रुपये के छोटे सिक्के बाजार में कोई नहीं ले रहा

दो रुपये के सिक्के नहीं ले रहे दुकानदार

पांच रुपये का स्टील का सिक्का लेना किया बंद

15 से 25 फीसद के कमीशन पर सिक्का बदलने को कालाबाजारी कर रहे मजबूर

Posted By: Jagran

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