गांव की धरती पर सियासी हल चलाकर दिल्ली के दरबार तक पहुंचे अपने भोले-भाले नेताजी ने कुछ ऐसा रुख दिखाया है कि सबके दिमाग सन्न हैं। सरकारी जश्न में मंच साझा करने वाले उनके भगवा कुनबे वाले उस वक्त तो बातें सुनकर बगलें झांक ही रहे थे, अब तो सियासी गलियारों में भी वह बातें न जाने क्या-क्या भावार्थ का मसाला लिए भटक रही हैं। हुआ यूं कि नेताजी को भगवा कुनबे की हुकूमत की तारीफों के पुल बांधने को बुलाया गया था। माइक थाम उन्होंने शुरुआत तो उसी लाइन से की, लेकिन फिर अचानक 'रिवर्स गियर' मारकर पंजे वालों के उन पुरखों का गुणगान करने लगे, जिन पर इन्हीं के सिरमौर नेता देश के लिए कुछ न करने की तोहमत लगाते रहे हैं। हद तो तब हो गई, जब अपने यह नेताजी खादी टोपी वालों के बखान में ऐसे डूबे कि शिक्षक दिवस के लिए भी सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन को भूलकर पंजे वाले पुरखे को ही प्रेरणा बताने लगे। मंच पर बैठे दीगर अतिथि अचानक नेताजी के दिल में जागे 'सर्वदलीय प्रेम' पर भौंचक रह गए। अब कहने को तो लोग जाने क्या-क्या कह रहे हैं। नेताजी का यह सच में 'भोलापन' ही था या निकट भविष्य में आसन्न राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर 'सियासी सयानापन।'

---

रंग ना तू मोहे गेरुआ..

कभी शहर के बने-बिगड़े इंतजाम संभालने वाले साहब को हुक्मरानों ने नगर की व्यवस्थाओं वाले 'अंगद कुर्सी' थमाई है तो साहब भी उसका हक अदा करने से चूक नहीं रहे। सरकारी फरमानों की तो छोड़िये, उनका तो पालन कराना ही है। अब यह सियासी संतुलन पर भी हाथ कौशल दिखाना चाहते हैं। भगवा खेमे की सत्ता के खिलाफ दीगर दलों वाले आए दिन एकजुटता दिखा रहे हैं। 'सिंह इज किंग' के अंदाज में साहब ने 'छपाक-छई' के बहाने सामने खेमे वालों पर पानी के सहारे आपसी मुहब्बत का गेरुआ रंग चढ़ाने की कोशिश की। बीवी-बच्चों सहित न सिर्फ माननीय, बल्कि अफसरों को भी न्योता भेज दिया गया। मगर, यह क्या दीगर दलों वाले शायद चाल समझ गए। अहसान तले आने से किनारा कर बैठ गए और छपाक-छई से इंकार कर दिया। अब साहब क्या करते? फैसला कैंसिल।

---

घरवाले भी बन गए मेहमान

मेहमानों का स्वागत, सत्कार तो सभी करते हैं लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि अपनी इज्जत बचाने के लिए घर वालों को भी मेहमान बना दिया जाता है। कुछ ऐसा ही वाकया पिछले सप्ताह के अंत में शहर में आयोजित एक कार्यक्रम में हुआ। आयोजकों ने दावे तो हजारों की भीड़ के किए थे और मैदान भी उसी के मुताबिक बुक किया गया था। लेकिन जब कार्यक्रम शुरू हुआ तो जितने लोग मंच पर थे, उतने ही लोग मंच के सामने थे। अब बाहर से जो लोग आ चुके थे, उनके सामने अपने नेता की इज्जत तो बचानी ही थी, इसलिए संचालक महोदय मैदान में जो भी आ रहा था, उसे किसी ना किसी शहर से आया हुआ बता माइक से उसका अभिवादन कर रहे थे। लोग देख रहे थे कि मैदान के बाहर यूपी 78 लिखी गाड़ियों से लोग आ रहे थे और अंदर जाते ही वे मेहमान बने जा रहे थे।

By Jagran