कानपुर, जेएनएन। हवा में मौजूद जहरीला धुआं बच्चों की सेहत पर असर डाल रहा है। उन्हें सांस लेने में दिक्कत, सीने में जकडऩ, आंखों में जलन, नाक में तेज दर्द की समस्या हो रही है। प्राइमरी के छात्रों में स्कूल पहुंचते ही उल्टी और बेहोश होने के लक्षण मिल रहे हैं। डॉक्टर ऐसे बच्चों का विशेष ध्यान रखने के लिए निर्देशित कर रहे हैं। उन्हें मुंह पर मास्क लगाकर ही स्कूल आने के लिए कहा जा रहा है।

सांस की समस्या वाले बच्चों को अधिक परेशानी

वायु प्रदूषण ने अस्थमा और सांस की समस्या वाले बच्चों की परेशानी बढ़ा दी है। वायरल, सर्दी, जुकाम, बुखार के बीच वायुमंडल में हानिकारक गैसों का स्तर उनके लिए खतरनाक साबित हो रहा है। जुकाम के साथ पर्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5, 10 और नैनो) की चपेट में आने से नाक, गले में एलर्जी होने लगी है। उन्हें काफी लंबी खांसी हो रही है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग के डॉ. एके आर्या ने बताया कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में वायु प्रदूषण का सबसे अधिक खतरा हो रहा है।

एक से दो महीने के बच्चों में सांस लेने की गति बहुत अधिक रहती है। यह एक मिनट में 60 बार होता है। दो महीने से पांच साल तक के बच्चों में सांस लेने की रफ्तार 40 बार रहती है। व्यस्क में रफ्तार कम होकर 16 हो जाती है। सांस लेने की अधिक रफ्तार की वजह से वह ज्यादा से ज्यादा दूषित वायु ले लेते हैं। ओपीडी में नुकसानदायक हवा की समस्या से ग्रसित होकर 20 फीसद अधिक मरीज आ रहे हैं। उनमें पसली चलना, सांस में आवाज आने की दिक्कत बढ़ी है।

चिकित्सक का ये है कहना

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विवेक सक्सेना ने बताया कि जुकाम के साथ दूषित हवा में जाने पर बच्चों की आंखों में जलन होने लगती है। अगर वह थोड़ा भी खेलते या कूदते हैं तो उन्हें उल्टियां आने लगती हैं। रोजाना ऐसे दो से तीन केस ओपीडी में आ रहे हैं। इसे अपर रेसपीरेटरी टैक्ट इंडयूस्ड वोमटिंग कहते हैं। बच्चों को एन 95 और एन 99 मास्क ही लगाकर स्कूल भेजें।

क्या करें, क्या न करें

- सर्दी, जुकाम, वायरल होने पर बच्चों को स्कूल न भेजें।

- फेफड़ों में तकलीफ होने पर डॉक्टर को दिखाएं।

- बिना परामर्श के दवाएं न खिलाएं।

- सांस की समस्या के लिए घर में एयर प्यूरीफायर लगाएं।

- अस्थमा के रोगी प्रदूषण में खेलकूद से बचें।  

Posted By: Abhishek

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