जागरण संवाददाता, कानपुर : अगर दिल से लिखा हुआ ही पाठकों को शब्दपाश में बांधता है तो शायद सुरेंद्र मोहन पाठक के पास दो दिल हैं। उनकी आत्मकथा के पन्ने पलटें या साक्षात रूबरू होकर बतिया लें, उनका जीवन और लेखन बिल्कुल विपरीत मिजाज का महसूस होता है। लिखते सनसनी और मर्डर मिस्ट्री हैं लेकिन जीते जिंदादिली, विनोदी स्वभाव और सिद्धांत के संग हैं। अपने काल्पनिक पात्रों को पाठकों की जिंदगी का हिस्सा बना देने वाले प्रख्यात अपराध कथा लेखक सुरेंद्र मोहन लेखन की हकीकत को बहुत चुनौतीपूर्ण मानते हैं। कहते हैं कि अच्छा लिखना बहुत कठिन है। मैं कभी नाम नहीं बेचता, हमेशा ईमानदारी से लिखता हूं।

उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक हाल ही में लिखी गई आत्मकथा 'न बैरी न कोई बेगाना' के साथ शनिवार को 'जागरण वार्तालाप' के मंच पर थे। जेड स्क्वॉयर मॉल स्थित वेन्यू पार्टनर क्रॉसवर्ड में आयोजित कार्यक्रम में सुरेंद्र मोहन के दिल को दैनिक जागरण के उप्र संपादक आशुतोष शुक्ल अपने सवालों और चर्चा से कुरेदते गए और उतनी ही खुशमिजाजी से पाठक अपनी जिंदगी की कहानी के पन्ने खोलते चले गए। 'ज्यादा मुश्किल क्या लिखना है, अपराध कथा या आत्मकथा?' सवाल के जवाब में सुरेंद्र मोहन पाठक की सादगी जाहिर होती है। कहते हैं कि मैंने जिंदगी में ऐसा कुछ किया नहीं कि आत्मकथा लिखी जाए। जब प्रकाशक ने मुझसे कहा कि आत्मकथा लिखिये तो मैं सोच में पड़ गया कि क्या लिखूं। सोचा था कि 50 पन्ने भी न लिख सकूंगा, लेकिन लिखना शुरू किया तो सात माह में 1200 पन्ने लिख डाले। वह कहते हैं कि मुश्किल लिखने में नहीं, चयन में आई। कुछ बातें किताब में नहीं लिखीं। व्यक्तिगत जीवन का खराब पक्ष नहीं लिखा। आत्मकथा के उल्लेखित आशिकाना मिजाज के जिक्र पर हंस देते हैं, कहते हैं कि मैंने तो एक शेर लिखा है। वह लेखन में अपना प्रेरक मित्र एमए सफी को बताते हैं। कहते हैं कि वह अच्छे परिवार से था। हाईस्कूल के बाद से ही लिखना शुरू कर दिया था। उसी से मुझे लेखन की प्रेरणा मिली।

अपनी कहानियों के हीरो सुनील कुमार चक्रवर्ती, विमल, सुधीर कोहली पर भी उन्होंने जवाब दिए। बोले कि मुझे जब कुछ याद आता है, तभी लिख लेता हूं। सुनील सीरीज पर मेरी तैयारी हमेशा चलती रहती है। वह बताते हैं कि सुनील सीरीज में जब एकरसता की शिकायत आने लगी तो सुधीर के रूप में उसके विपरीत कैरेक्टर बना डाला।

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250 रुपये में शुरू की टेलीफोन मैकेनिक की नौकरी

19 फरवरी 1940 को जन्मे सुरेंद्र मोहन पाठक हंसते हुए बताते हैं कि बाप का डंडा मजबूत न होता तो कभी नौकरी न करता। मात्र 250 रुपये के वेतन में टेलीफोन मैकेनिक के रूप में नौकरी शुरू की। कई किस्सों से जाहिर करते हैं कि उन्होंने सिद्धांतों से समझौता न करते हुए हमेशा ईमानदारी से काम किया। सेवानिवृत्ति के दिन भी शाम चार बजे तक दफ्तर में काम किया। काम से मुंह नहीं मोड़ा, जबकि उनके साल भर के वेतन के बराबर एक उपन्यास की फीस हो गई थी। शरारत भरे बचपन के एक किस्से का आत्मकथा में भी जिक्र है कि घर में मेहमान की खातिरदारी न करना पड़े, इसलिए गली में मिले मेहमान को अपने ही घर का पता नहीं बताया था।

20 साल से नहीं पढ़ा कोई जासूसी उपन्यास

आपका पसंदीदा अपराध कथा लेखक कौन है? इस सवाल पर बड़ी साफगोई से सुरेंद्र मोहन कहते हैं कि कोई नहीं। मैंने 20 साल से किसी जासूसी उपन्यास को नहीं पढ़ा। हां, लेखकीय का रिवाज शुरू करने का श्रेय अपने खाते में पूरे आत्मविश्वास से डालते हैं। ¨हदी की स्थिति पर उन्होंने काफी चिंता जताई। कहा कि सरकार ¨हदी पखवाड़े का तमाशा करती हैं। सच यह है कि मेरी ही किताब ¨हदी में सस्ती और अंग्रेजी अनुवाद महंगा खरीदा जाता है। वह पढ़ने की आदत को ही ¨हदी की मजबूती का रास्ता मानते हैं।

Posted By: Jagran

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