कानपुर, जेएनएन। कोरोना महामारी के कारण हुए लॉकडाउन में शहर की गंगा-जमुनी संस्कृति भी खूब दिखाई दे रही है। बुधवार को जहां मुंशीपुरवा में एक हिंदू महिला के अंतिम संस्कार में मुस्लिम समाज के लोग शामिल हुए थे, गुरुवार को ठीक वैसा ही नजारा छावनी स्थित नरोना रोड पर देखने को मिला। यहां एक बुजुर्ग रिक्शा चालक की मौत के बाद जब अपनों ने कंधा देने से मना कर दिया तो मोहल्ले के ङ्क्षहदू व मुसलमानों ने मिलकर शव का अंतिम संस्कार करवाया।

इलाज न होने पर उर्सला से चले आए थे घर

छावनी में जयपुरिया क्रासिंग के पास नरोना रोड स्थित बंगला नंबर 72 में रिक्शा चालक कौशल की झोपड़ी थी। पत्नी और बेटे की मौत हो चुकी है। बेटी सीतापुर में ब्याही है। बेटे की मौत के बाद से पोते ने उनसे दूरी बना ली थी। तीन दिन पहले वह बीमार हुए तो मोहल्ले वाले उर्सला में भर्ती करा आए। इलाज न होने पर भूख से बेहाल कौशल बुधवार को अस्पताल से घर भाग आए थे। गुरुवार दोपहर डेढ़ बजे उनकी मौत हो गई। पोते ने अंतिम संस्कार से मना कर दिया तो दामाद ने लॉकडाउन की बता कह पल्ला झाड़ लिया। स्थानीय शाहरुख अहमद ने बताया कि जब पड़ोसी हिंदू व मुस्लिम परिवारों को जानकारी हुई तो उन्होंने अंतिम संस्कार का फैसला लिया। ङ्क्षहदू रीतिरिवाज के साथ सजी अर्थी को लोगों ने राम नाम सत्य है बोलते हुए कंधा दिया। इसके बाद जाजमऊ में बुढिय़ा घाट का कब्रिस्तान में शव को दफना दिया गया। मोहल्ले के राजू सविता, गया प्रसाद, मो. असलम, मो. सुभानी, अजमत ओला, मो. अकील, आमिर खान शामिल रहे।

चार कब्रिस्तानों में दफनाए जाते हिंदू

शहर में बाकरगंज, नजीराबाद समेत चार कब्रिस्तानों में  हिंदुओं की कुछ जातियों के लोगों को दफन किया जाता है। यह परंपरा वर्षों पुरानी है। अछूतानंद कब्रिस्तान की देखरेख करने वाले पीर मोहम्मद बताते हैं कि उनके बाबा ने 1935 में इस कब्रिस्तान की देखरेख शुरू की थी। सामान्य तौर पर आठ से 10 पार्थिव शरीर दफनाने को रोज लाए जाते हैं। जाजमऊ में बुढिय़ाघाट के पास एक कब्रिस्तान स्थित है। नौबस्ता में बंबा के आगे  हिंदुओं का एक कब्रिस्तान है, लेकिन वहां अब शवों का दफनाना बंद हो गया है।  

Posted By: Abhishek Agnihotri

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