कानपुर, जेएनएन। वरिष्ठ साहित्यकार मंगलेश डबराल ने कहा है कि 'हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है', 'क्रांति के लिए उठे कदम क्रांति के लिए जली मशाल', 'मेरा नाम तेरा नाम वेतनाम-वेतनामÓ... यह कविताएं उस जमाने में लिखी गईं जब अपना हक मांगने के लिए संघर्षों का दौर जारी था। भारत में ही नहीं बल्कि अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस व ब्रिटेन समेत कई देशों में कविताओं ने क्रांति को हवा दी। तब से लेकर अब तक निरंकुश शासक के दमन पर कविताएं अंकुश लगा रही हैं।

वीएसएसडी डिग्री कॉलेज में 'विश्व कविता में प्रतिरोध' विषय पर व्याख्यान देने आए मंगलेश डबराल ने दुनिया के कई कवियों की रचनाओं का जिक्र करते हुए बोलों को बहुमूल्य बताया। कहा, कविता की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि समय-समय पर इसने तानाशाह के सिंहासन हिलाकर रख दिया। कई कवियों ने तो सच्चाई लिखने के लिए अपने जीवन का बलिदान भी दे दिया। स्पेन के पाबलो नेरुदा व वॉल्टर बैंजामिन जैसे साहित्यकारों ने मानवता की रक्षा के लिए अपनी कलम चलाई। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला व सुमित्रानंदन पंत जैसे भारत के कवियों की रचनाओं ने लोगों को जीवन का सार समझाया। उस जमाने में निकलने वाले कविता पोस्टर आज भी कारगर हैं।

रोई, चीखी व चिल्लाई है कविता

वरिष्ठ साहित्यकार मंगलेश डबराल ने बताया कि कविता ने बहुत कुछ झेला है। वह रोई, चीखी व चिल्लाई है। एक जमाना था जब कविताओं के माध्यम से सच्चाई लिखने पर गोली तक मार दी जाती थी। देश निकाला देने के अलावा मृत्यु के बाद भी रचनाकारों को अपमानित किया जाता रहा है। अब समय बदल रहा है लेकिन एक बात नहीं बदली। कार्यक्रम में प्रबंध मंडल के सचिव वीरेंद्रजीत सिंह, प्राचार्य डॉ. छाया जैन, उप प्राचार्य डॉ. मंजू द्विवेदी, विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज चतुर्वेदी, डॉ. राकेश शुक्ल, डॉ. मनोज अवस्थी, साहित्यकार नीलांबर कौशिक सहित अन्य शिक्षक व छात्र छात्राएं मौजूद रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र राव ने व संचालन डॉ. आनंद शुक्ल ने किया।

Posted By: Abhishek

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