कानपुर, [अम्बर वाजपेयी]। पथ, परजानिया, अदृश्य, पैडमैन और केसरी जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके राकेश चतुर्वेदी 'ओम' फिल्म इंडस्ट्री का जाना-पहचाना चेहरा हैं। खास बात ये है कि वह अदाकारी के साथ फिल्म निर्देशन और लेखन में भी सक्रिय हैं। निर्देशक के तौर पर उनकी दो फिल्में रिलीज हो चुकी हैं और एक फिल्म रिलीज होने की कतार में हैं। कानपुर में पले-बढ़े राकेश बिरहाना रोड इलाके की गलियों में शूटिंग की चाहत रखते हैं। पढि़ए उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश...।

केसरी फिल्म में आप सईदुल्लाह के किरदार में दिखे, नकारात्मक किरदार निभाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा ?

  • हर किरदार निभाना चुनौतीपूर्ण ही होता है। एक एक्टर के तौर पर आपकी तैयारी इसे आसान बना देती है। मैंने बहुत थिएटर किया है, फिल्मों और टीवी शो में हर तरह के किरदार किए हैं। इसलिए कोई समस्या नहीं हुई। सईदुल्लाह का किरदार लिखने के लिए काफी रिसर्च हुआ था। उसे पढ़ा और अभ्यास किया।

अभिनय, निर्देशन और लेखन में संतुलन कैसे करते हैं?

  • बहुत ही आसानी है, अभिनय से ब्रेक लेकर लेखन करता हूं और लेखन से ब्रेक लेकर निर्देशन। एक समय में एक ही काम पर फोकस आपके काम को निखारता है।

निर्देशक-एक्टर के तौर पर नए साल से क्या उम्मीदे हैं?

  • बहुत ही ज्यादा, मैं बोलो राम और बीएचके भल्ला फिल्म का निर्देशन कर चुका हूं। आने वाली फिल्म मंडली है, जिसे मैं ही निर्देशित कर रहा हूं। इसमें रजनीश दुग्गल, कंवलजीत सिंह जैसे मंझे कलाकार हैं। इसके अलावा बाबा आजमी साहब की एक फिल्म में नसीर साहब के साथ पर्दा साझा करता नजर आऊंगा। धूर्त फिल्म भी रिलीज होने वाली है।

अभिनय के क्षेत्र में करियर बनाने के बारे में कब तय किया?

  • कानपुर में मेरा घर बिरहाना रोड पर है। यहीं पला-बढ़ा और पढ़ाई की। मुझे याद है कि उस समय पास होने पर पिता डा. रामअवध चतुर्वेदी टाकीज में फिल्म दिखाने ले जाया करते थे, तभी फिल्मी दुनिया में जाने का मन बनाया। ज्ञान भारती स्कूल में कक्षा आठ में पढ़ाई के दौरान मिमिक्री में प्रथम पुरस्कार मिला तो हौसला बढ़ा और तय कर लिया कि अब मुंबई ही जाना है।

मुंबई का रुख कब किया, सुना है एक बार आप लौट भी आए थे?

  • जी हां, मैं सन् 1991 में बारहवीं पास करने के बाद मुंबई गया था। वहीं से जाना कि एक्टिंग का भी कोर्स होता है। उसके बाद कानपुर वापस आ गया और 'दर्पण' थिएटर ग्रुप से जुड़ा। डीएवी कॉलेज स्नातक करने के बाद दिल्ली में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से कोर्स किया। इसके बाद सन् 2000 में दोबारा मुंबई गया।

पथ फिल्म से पहला ब्रेक मिला, इसके बारे में कुछ बताएं ? 

  • 2003 में मुझे पथ फिल्म मिली। बीते तीन साल बेहद संघर्ष भरे थे। इस दौरान मैनें कई सीआडी, अपराधी कौन, सारा आकाश जैसे टीवी शो किए, लेकिन टीवी इंडस्ट्री रास नहीं आई। इसके बाद मैं नसीरुद्दीन साहब के थिएटर ग्रुप से जुड़ गया। इसी दौरान ऑडीशन दिया और पथ फिल्म के लिए सिलेक्ट हो गया।

20 साल के करियर में आपने ज्यादा समय थिएटर में बिताया ऐसा क्यों ?

  • एक अभिनेता के लिए थिएटर बहुत जरूरी है। यह एक तरह का अभ्यास है। इसीलिए मेरा पूरा फोकस थिएटर पर रहा। सिर्फ वही फिल्में की, जिनका रोल पसंद आया। साथ ही साथ लेखन करता रहा।

एक अच्छी स्क्रिप्ट लिखने के लिए सबसे जरूरी क्या मानते हैं ?

  • एक लेखक के तौर पर आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। आपको हर छोटी से छोटी चीज का ध्यान रखना होता है। मैंने ए थिन लाइन, टू बॉर्न नॉट टू बी, बीएचके भल्ला और बोलो राम चार फिल्में लिखीं। इनमें कहीं न कहीं मुझसे, परिवार से रिश्तेदारों से समाज से जुड़ी कहानियां थीं। रोजमर्रा घटने वाली घटनाओं को बेहतर तरीके से प्रस्तुत करना ही अच्छा लेखन है। इससे आप दर्शकों से सीधे जुड़ते हैं।

कानपुर को कितना मिस करते हैं, यहां शूटिंग की कितनी संभावनाएं हैं?

  • कानपुर मेरा अपना शहर है, बचपन से जवानी तक का वक्त मैनें यही बिताया। साल में एक-दो बार शहर में आना होता है। यहां की आलू चाट को मैं मुंबई में सबसे ज्यादा मिस करता हूं। यहां शूटिंग की अपार संभावनाएं हैं। बाला फिल्म में कई ऐसे स्थल हैं जो दिखाए भी गए। मैं कानपुर को लेकर कुछ स्क्रिप्ट लिख रहा हूं। मेरी चाहत यही है कि जहां पला-बढ़ा वहां शूटिंग जरूर की जाए।  

Posted By: Abhishek

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