ज्योति अग्निहोत्री [जागरण स्पेशल]। मशहूर अभिनेता आमिर खान की दंगल फिल्म दर्शकों के दिल-ओ-दिमाग पर छा गई थी और इस फिल्म में असल किरदार महिला पहलवान गीता फोगाट की कहानी चर्चा में आई। कुछ ऐसी ही कहानी है ज्योति चतुर्वेदी की, जो शहर में गीता फोगाट की तरह अपनी पहचान बना चुकी हैं। जज्बे, हौसले और जिद ने उन्हें दंगल गर्ल बनाया है। अखाड़े में जोर आजमाइश की उसकी फरमाइश को मजदूर मां-बाप ने बल दिया तो मेहनत मजदूरी के इस सपने को साकार करने में बेटी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। नए साल में मा-बाप के त्याग और संघर्ष का तोहफा राष्ट्रीय दंगल प्रतियोगिता में दंगल केसरी का खिताब जीतकर दिया है।

ये बेटी है कन्नौज के ठठिया क्षेत्र के गांव औसेर निवासी 22 वर्षीय ज्योति चतुर्वेदी। वह बताती हैं कि साल 2014 में गांव में महिलाओं की कुश्ती हो रही थी। बस यहीं से उन्होंने पहलवान बनने का सपना पाल लिया और अपने मां नेमा और पिता रामकिशन को बताया। बेटी के सपने को साकार करने के लिए पिता ने अपने खेतों के साथ दूसरे के खेतों में भी मजदूरी की, जिसमें उनकी मां ने भी अपने पति के साथ हाथ बंटाया।

कानपुर के अखाड़े में सीखे दांव-पेच

ज्योति ने बताया कि गांव में आयोजित दंगल के दौरान उनकी मुलाकात झांसी के पहलवान बालमुकुंद से हो गई। उसने उन्हें अपना गुरू बना लिया। कानपुर के भगवान दास अखाड़े में उसने पहलवानी के दांव-पेच सीखे। पहली कुश्ती 2014 में झांसी में हुई, जिसमें वो हार गईं। दूसरी कुश्ती मध्यप्रदेश में हुई, जिसमें नेहा तोमर को हराकर पहली बार जीत का स्वाद चखा। कानपुर में भी उन्होंने कई बार दंगल में दम दिखाया। अब वो छोटी बहन को कुश्ती के दांव-पेच सिखा रही हैं। ज्योति का परिवार बेहद गरीब है। सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें नहीं मिला।

पुरुष पहलवान को हराकर जीता खिताब

30 दिसंबर को रायबरेली के हुए राष्ट्रीय दंगल के फाइनल मुकाबले में ज्योति की टक्कर मध्य प्रदेश के पहलवान अजय से हुई। इसमें ज्योति ने दंडक दांव लगा कर अजय को चित कर दंगल केसरी का खिताब अपने नाम किया। फाइनल में पहुंचने से पहले ज्योति ने मेरठ की शिवानी को पटखनी दी थी।

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