फकीरों के आगे शहंशाह यों ही सजदा नहीं करते, एक वक्त आता है जब दुनियावी ताकत पर उनका भरोसा टूटता है और तब वे ऐसे सूफी संतों की दर पर पहुंचते हैं, जिनकी झोली दुआओं से लबरेज रहती है। बिल्हौर के मकनपुर की हजरत बदीउद्दीन जिंदा शाह मजार और जाजमऊ में सूफी संत मखदूम शाह अलाउल हक का मकबरा ऐसे अनेक ऐतिहासिक पलों की गवाह हैं। यहां बनी मस्जिद की इमारतें तुगलक काल से लेकर मुगलकाल तक की वास्तुकला का भी नमूना हैं। यूं तो कानपुर शहर में करीब सौ मस्जिदें हैं, लेकिन इन दोनों मस्जिदों से जुड़ी किवदंतियां और ऐतिहासिक तथ्य बेहद रोचक हैं। शहर की ऐसी ही कुछ प्रमुख दरगाहों, मकबरों और मस्जिदों से परिचित करा रहे हैं श्रीनारायण मिश्र...।

विदेशों तक है बदीउद्दीन जिंदा शाह की ख्याति

कानपुर ग्रामीण में बिल्हौर के मकनपुर में हजरत बदीउद्दीन जिंदा शाह की मजार है। कौमी एकता की मिसाल इस मजार में हिंदु-मुस्लिम दोनों का बराबर विश्वास है। दोनों संप्रदायों की ओर से यहां मेले लगते हैं। इसमें विदेशों से भी अकीदतमंद आते हैं। सूफी संत हजरत बदीउद्दीन जिंदा शाह को लेकर अनेक किवदंतियां हैं। उनके यहां आने, जन्म और मृत्यु के बारे में कहीं कोई अभिलेखीय जानकारी नहीं मिलती। हालांकि लगभग तय माना जाता है कि सन् 1431 या सन् 1433 में उन्होंने दुनिया से पर्दा कर लिया था। ऐसे में इतिहास के जानकार उनके आने का समय तुगलक काल को मानते हैं। इनके समर्थक मानते हैं कि उन्होंने 596 वर्ष की आयु पाई थी। इन्हें मदारी पंथ का संस्थापक माना जाता है। क्योंकि नट, कहार, मदारी और नाचने वाले बंजारों में इनकी बहुत लोकप्रियता थी। इन्हें कुतुब (सूफियों में सबसे बड़े) माना जाता है।

शिक्षाविद् मजहर अब्बास नकवी व ब्रह्मïावर्त शोध संस्थान के सदस्य अजय त्रिवेदी ने बताया कि कानपुर गजेटियर और इतिहासकार नारायण प्रसाद अरोड़ा की पुस्तक कानपुर का इतिहास में उल्लेख है कि बदीउद्दीन शाह सीरिया से आए थे। जिस पानी की जहाज से वे आ रहे थे, वह तूफान में टूट गया। शाह पटरे पर सवार होकर हिंदुस्तान पहुंच गए। यायावर बदीउद्दीन शाह खंभात से जौनपुर, कालपी और घाटमपुर होते हुए मकनपुर पहुंचे थे। कहते हैं कि उस वक्त इन्हें एक तालाब से ...या अजीजो, ...या अजीजो.. की आवाज आई। इससे उन्होंने समझ लिया कि अब उनके जीवन का पड़ाव आ गया है और वे यहीं बस गए। हिंदू और मुस्लिम दोनों संप्रदाय उनका उर्स अलग-अलग मनाते हैं। जिस दिन उन्होंने पर्दा किया था, उस दिन इस्लामी कैलेंडर के अनुसार 17 जमादुल अव्वल तारीख थी। उसी दिन बसंत पंचमी का दिन था। इसलिए बसंत पंचमी पर छोटा मेला लगता है। इसमें पशु बाजार लगता है। जबकि 17 जमादुल अव्वल को बड़ा मेला लगता है।

मजार के इमारत पर मुगलकाल की छाप

वास्तुकला के नजरिए से मजार की इमारत पर मुगलकाल की छाप दिखती है। बताया जाता है कि इसका गुंबद जौनपुर के बादशाह इब्राहिम शर्की ने बनवाया था। जबकि यहां लगी संगमरमर की जालियां मुगल शासक औरंगजेब ने बनवाई। राजा दतिया और राजा ग्वालियर ने यहां खीर पकाने की देग दी है। जबकि अवध के नवाब के राजस्व मंत्री राजा टिकैत राय ने यहां कुआं बनवाया।

शहर की शान है जामा मस्जिद

पटकापुर में स्थित जामा मस्जिद शहर की सबसे बड़ी मस्जिद है। 175 साल बनी मस्जिद बाहर और अंदर दोनों ओर से बेहद आकर्षक है। इसमें जगह-जगह शानदार नक्काशी की गई है। मस्जिद के पेश इमाम कारी शमशेर आलम बताते हैं कि यहां 38 साल पहले सहारनपुर के मौलाना अशरफ अली थानवी ने मदरसा जामे उलूम की नींव रखी। आज ये मस्जिद पूरे देश में प्रसिद्ध है।

शीशमहल सरीखी है औरंगजेब की बनवाई आलमगीरी मस्जिद

बदीउद्दीन शाह की मजार के पास ही आलमगीरी मस्जिद है। जिसे आलमगीर की पदवी धारण करने वाले मुगल शासक औरंगजेब ने बनवाया था। इतिहासकारों के मुताबिक औरंगजेब को सूफी संतों का विरोधी माना जाता था। कहा जाता है कि इसी वजह से वह मजार को तोडऩे के लिए आया। इस दौरान रूहानी शक्तियों ने उसे आगाह किया। इसके बाद वह यहां घुटनों के बल आया। उसने यहां पर आलमगीरी मस्जिद का निर्माण करवाया। मस्जिद में मिहराब, मेहराब, चबूतरे और गुंबद से लेकर हर जगह मुगलकाल की वास्तुकला झलकती है। मस्जिद में तीन प्याजी आकार के गुंबद हैं। अंदर कांच का शानदार काम किया गया है। जो आगरा के शीशमहल की झलक देता है।

तुगलक काल में बना ख्वाजा मख्दूम शाह का मकबरा

जाजमऊ में गंगा पुल से पहले दाहिने टीले को कानपुर शहर का सबसे प्राचीन बसावट वाला क्षेत्र माना जाता है। इस क्षेत्र को राजा ययाति के अधीन माना जाता है। सिद्धपुरी कहलाने वाले इस क्षेत्र में यह मकबरा 1358 ई. में फिरोज शाह तुगलक ने बनवाया था। कहा जाता है कि जब फिरोज शाह तुगलक बंगाल पर आक्रमण करने जा रहा था, उस वक्त सूफी संत ख्वाजा मख्दूम शाह अलाउल हक उसके साथ ही थे। मख्दूम शाह जाजमऊ के पास ही बस गए। बाद में फिरोज शाह तुगलक ने ही उनकी मजार और मकबरे की तामीर करवाई। इस इमारत को शहर की सबसे प्राचीन इमारत माना जाता है। हालांकि समय समय पर मरम्मत के कारण इस इमारत पर तुगलक काल की वास्तुकला का बहुत असर अब दिखाई नहीं देता है। 

यहां लगती है जिन्नों की कचहरी

ख्वाजा मकदूम शाह के मकबरे के पास ही जिन्नातों की मस्जिद है। इस मस्जिद के निर्माण की जानकारी केवल किवदंतियों में ही मौजूद है। इतिहास के जानकार अजय त्रिवेदी बताते हैं कि किवदंतियों के अनुसार मस्जिद निर्माण से पहले यहां का शासक बेहद क्रूर था। वह हर त्योहार या खुशी के मौके पर एक स्थानीय नागरिक की बलि दे देता था। बलि देने वाले की आत्माएं जिन्न बन जाती थीं। एक बार एक पीर ने शासक का विरोध कर यह प्रथा बंद करा दी। इससे जिन्नात बेहद खुश हुए और उन्होंने रातों रात इस मस्जिद का निर्माण कर दिया। ऐसे में इस मस्जिद के निर्माण का सही समय भी नहीं पता चलता। लेकिन, इसका निर्माण करीब साढ़े चार सौ साल पुराना माना जाता है। मान्यता है कि जिन लोगों पर भूतों-प्रेतों का साया रहता है। वे इस मस्जिद में आकर उससे मुक्ति पा जाते हैं। यहां हर गुरुवार को जिन्नों की कचहरी लगती है। इसमें कथित तौर पर भूत प्रेत के साये से परेशान लोग आते हैं। मौलवी की मदद से जिन्न उस बुरी आत्मा को शरीर छोड़कर जाने की हिदायत देते हैं। ऐसा न होने पर वे उसे फांसी की सजा सुना देते हैं।

औरंगजेब ने करवाया मस्जिद का पुनर्निर्माण

मुगल शासक औरंगजेब ने जिन्नातों की इस मस्जिद का पुनर्निर्माण करवाया था। कहा जाता है कि औरंगजेब की बेगम एक बार बहुत बीमार हो गईं। ऐसे में कानपुर के मुगल सूबेदार कुलीच खान उन्हें इस मस्जिद में लाए। जहां वे बिल्कुल ठीक हो गईं। इस बात से खुश होकर औरंगजेब के कहने पर सन् 1679 में कुलीच खान ने इस मस्जिद का पुनर्निर्माण करवाया। इसलिए इस मस्जिद में भी मुगलकाल की वास्तुकला की खूबसूरती नजर आती है। यहां खूबसूरत नक्काशी के साथ मिहराब बनाया गया है। मीनार से लेकर बरामदे और गुंबद तक हर तरफ मुगलकालीन वास्तुकला के रंग दिखते हैं।

कानपुर शहर की कुछ प्रमुख मस्जिदें

हबीबा मस्जिद, नूरानी मस्जिद, मस्जिद इमामन सरदार, मस्जिद तहसीलदार, सुनहरी मस्जिद, मस्जिद खैर, हाजी बुलाकी मस्जिद, मस्जिद ए फहीमाबाद, जामा मस्जिद अशरफाबाद, मक्का मस्जिद जाजमऊ, जामा मस्जिद रावतपुर, मस्जिद नानपारा आदि।

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Posted By: Abhishek

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