कानपुर, [शशांक शेखर भारद्वाज]। तेज धूप में लोग गर्मी से तो बेहाल होते ही हैैं, सबसे अधिक खतरा अल्ट्रा वायलेट (यूवी) किरणों का होता है। यह त्वचा संबंधी रोग के साथ ही कैंसर तक का कारण बन सकती हैं, लेकिन अब कड़ी धूप में भी आप मुस्कुरा सकेंगे। उत्तर प्रदेश वस्त्र प्रौद्योगिकी संस्थान (यूपीटीटीआइ) के विशेषज्ञों ने ऐसा कपड़ा तैयार किया है, जिस पर धूप और अल्ट्रा वायलेट किरणों का असर नहीं होता है। यह कपड़ा गर्मी से बचाएगा और शरीर के लिए आरामदायक भी रहेगा। यह कपड़ा दक्षिण अफ्रीका में होने वाले  पौधे से मिलने वाले बायो पालीमर लिगनिन से तैयार नाइलान से बना है।

पेटेंट की तैयारी: यूपीटीटीआइ इस तकनीक को पेटेंट कराने जा रहा है जबकि रिसर्च को पोलैंड के जर्नल में प्रकाशित किया गया है। प्रो. अरुण सिंह गंगवार ने प्रो. प्रशांत विश्नोई और प्रो. मुकेश सिंह के सहयोग से तकनीक विकसित की है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के एक पौधे से मिलने वाले बायो पालीमर लिगनिन का नाइलान के कपड़े पर उपयोग किया। सबसे पहले जीसीटी टेक्सटाइल मिल, फगवाड़ा से इसका धागा बनवाया गया। उस धागे से कानपुर में कपड़ा तैयार हुआ। लिगनिन की ब्लेंडिंग (मिश्रण) धागा बनाने की प्रक्रिया के दौरान हुई। यह धुलाई में खराब नहीं होता है।

अगले साल बाजार में आने की उम्मीद: प्रो. अरुण सिंह गंगवार ने बताया कि पेटेंट होने के बाद इस तकनीक को किसी कंपनी को देंगे। इसके बाद वह उत्पादन करेगी। अगले वर्ष तक कपड़ा बाजार में आने की उम्मीद है।

अल्ट्रा वायलेट किरणें शरीर के लिए नुकसानदायक: जीएसवीएम मेडिकल कालेज के डर्मेटोलाजी विभाग के प्रमुख प्रो. डीपी शिवहरे ने बताया कि अल्ट्रा वायलेट किरणों से सन बर्न, शरीर में दाने और कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं। ऐसे मरीजों को दवाओं के साथ ही सन प्रोटेक्शन क्रीम के उपयोग की सलाह दी जाती है। अल्ट्रा वायलेट किरणों की तीव्रता स्किन कैंसर का कारण भी बन सकती है।

अल्ट्रावायलेट प्रोटेक्शन फैक्टर पर निर्भर : प्रो. गंगवार के अनुसार कपड़े की अल्ट्रा वायलेट किरणों को अवशोषित करने की क्षमता अल्ट्रा वायलेट प्रोटेक्शन फैक्टर (यूवीपीएफ) पर निर्भर करती है। यूवीपीएफ 15 से कम है तो इसे असुरक्षित कहा जाता है। 15 से 24 अच्छा, 25 से 39 बहुत अच्छा और 40 से 45 श्रेष्ठ रहता है। उन्होंने बताया कि यूपीटीटीआई में बनाए गए कपड़े के रेशों की खासियत है कि ये यूवी किरणों से बचाने के साथ ठंडक भी देंगे। इसके रेशे काटन और खादी की तरह ही हैं जिससे गर्मी का अहसास नहीं होगा।

टेक्सटाइल में पहली बार हुआ प्रयोग: प्रो. अरुण सिंह गंगवार ने बताया कि दक्षिण अफ्रीका में बायो पालीमर लिगनिन का उपयोग भवन और सड़क निर्माण में किया जाता है। पेपर व अन्य उद्योगों में भी हो रहा है, मगर यूपीटीटीआइ के विशेषज्ञों ने इसका इस्तेमाल टेक्सटाइल में पहली बार किया है। यह अल्ट्रा वायलेट किरणों के खतरे को रोकने के लिए कपड़ों में उपयोग हो रही कई तरह की डाई से एक तिहाई सस्ता है। डाई शरीर को नुकसान पहुंचा सकती है, कई बार की धुलाई में उसका असर कम हो जाता है। लिगनिन की ब्लेंडिंग फाइबर, धागे और कपड़े बनाने की किसी भी प्रक्रिया के दौरान हो सकती है।

Edited By: Shaswat Gupta