• अपने लिए जिए तो क्या जिए.., तू जी, ऐ दिल, ज़माने के लिए..,
  • बाजार से जमाने के, कुछ भी न हम खरीदेंगे..,
  • हां, बेचकर खुशी अपनी, लोगों के गम खरीदेंगे..,
  • बुझते दिये जलाने के लिए, तू जी, ऐ दिल, ज़माने के लिए
  • अपने लिए जिए तो क्या जिए...।।

कानपुर, अभिषेक अग्निहोत्री। वर्ष 1966 में बनी फिल्म बादल में मन्ना डे की आवाज और जावेद अनवर के लिखे इस गीत के बोल आज कानपुर के मनोज सेंगर पर एकदम सटीक बैठ रहे हैं। शायद इसलिए भी कि इस गीत की गूंज मां के गर्भ में रहते समय उनके कानों में पड़ती रही होगी क्योंकि उनका जन्म भी 1967 में ही हुआ। महाभारत के अर्जुन के बेटे अभिमन्यु की तरह उन्होंने भी गर्भकाल का पाठ ऐसा जेहन में बिठा लिया कि जन्म के बाद आज 54 वर्ष की आयु में भी दूसरे के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुके हैं। कुरीतियों के खिलाफ जंग छेड़ करके वो दूसरों को नई जिंदगी दे रहे हैं और नई परंपरा का सूर्य उदय करके समाज को दिशा दे रहे हैं। हाल ही में उनका नाम समाजसेवा के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान के लिए नामांकित हुआ है।

कोन हैं मनोज सेंगर

कानपुर में समाज सेवा के प्रति समर्पित लोगों का नाम लिया जाए तो मनोज सेंगर का नाम खुद-ब-खुद ही जुबान पर आ जाता है। उन्होंने देहदान की शुरुआत करके कई दिव्यांगों को नया जीवन दिलाया तो अस्थि कलश बैंक स्थापित करके नई पीढ़ी को पूर्वजों के सम्मान की नसीहत दी है। मूल रूप से इटावा के रहने वाले बृजपाल सिंह सेंगर की नौकरी हिंदुस्तान एयरोनाटिकल लिमिटेड में लगी तो करीब 60 वर्ष पूर्व वह पत्नी गिरीश कुमारी को लेकर जेके कालोनी कानपुर में आकर बस गए। गिरीश कुमारी ने तीन जुलाई 1967 को बेटे को जन्म दिया और नाम मनोज रखा गया। मनोज सेंगर ने बचपन अपने एक भाई और एक बहन के साथ व्यतीत किया लेकिन उनका ध्यान हमेशा समाज सेवा पर ही केंद्रित रहता था। पढ़ाई पूरी की और युवा अवस्था में धर्म-अध्यात्म से जुड़ गए।

गायत्री परिवार के समारोह ने बदली जीवन की दिशा

मनोज सेंगर बताते हैं कि वर्ष 1990 में हरिद्वार में गायत्री परिवार का श्रद्धांजलि समारोह आयोजित हुआ था, जहां से उनके जीवन की दिशा ही बदल गई। समारोह में गुरुमाता भगवती देवी शर्मा ने शादी तो करें पर नि:संतान रहने का संकल्प लेने का आह्वान किया था। समारोह में देश भर से 25 लाख से भी ज्यादा लोग शामिल हुए थे लेकिन कुल आठ लोगों ने गुरुमाता के आह्वान पर संकल्प लिया। इन आठ लोगों में वह भी शामिल थे और उसी संकल्प काे पूरा करते हुए शादी के 27 साल बाद भी नि:संतान हैं।

अंतर्राजातीय विवाह के लिए रहे अडिग

मनोज सेंगर बताते हैं कि उन्होंने खुद अंतर्राजातीय विवाह करके जातीय बंधन को तोड़ने का प्रयास किया। वह क्षत्रिय परिवार से ताल्लुक रखते हैं और उनकी पत्नी माधवी कायस्थ परिवार की हैं। इस समाज में क्षत्रिय युवाओं पर जाति में ही शादी की सख्त बंदिशें होती हैं, जिसे तोड़कर उन्होंने कायस्थ परिवार में वर्ष 1993 में शादी की। शादी पर हमारे और पत्नी के परिवारों ने बहुत विरोध किया, बहुत दबाव पड़ा और प्रलोभन भी मिले लेकिन मैं अपने फैसले पर अडिग रहा। पत्नी माधवी ने सात फेरों संग मुझे और मेरे संकल्प दोनों को अपनाया। बच्चे के लिए माधवी को समाजिक तानों का भी सामना करना पड़ा और परिवार के कार्यक्रमों में बहिष्कृत भी होना पड़ा लेकिन हम कभी अपने संकल्प से नहीं डिगे।

मानवती आर्या ने जिंदगी को दी दिशा

मनोज सेंगर बताते हैं कि आजाद हिंद फौज की महिला लेफ्टिनेंट मानवती आर्या की एक पहल ने उनके जीवन की दिशा दी। 20 जनवरी 2003 को मानवती आर्या जी अपने पति का पार्थिव शरीर लेकर देहदान के लिए मेडिकल कालेज पहुंची थीं। देहदान करना या कराना दोनों ही आज के समाज में परंपरा के खिलाफ है, जब मैंने इसे गंभीरता से समझा तो मन विचलित हो उठा। देहदान समाज के लिए कितना जरूरी है, इसकी अहमियत समझ में आ गई। मेडिकल साइंस हो या फिर नेत्र दिव्यांग या गंभीर रोगियों के लिए देहदान का कितना उपयोग हो सकता है, यह समझ आ गया था। मैनें देहदान कराना ही अपने जीवन का उद्​देश्य बनाया और युग दधिची देहदान संस्था की शुरुआत करके मुहिम में जुट गया।

श्मशान घाट पर लोगों को किया प्रेरित

मनोज सेंगर कहते हैं कि रूढ़वादी समय में देहदान के लिए लोगों को प्रेरित करना सबसे कठिन काम है। इस काम के लिए मैंने श्मशान घाट को ही चुना क्योंकि जब व्यक्ति किसी के अंतिम संस्कार में घाट पर आता है तो उसके मन में एक पल के लिए सामाजिक विरक्ति और सत्कर्म करने का ख्याल जरूर आता है। लोगों को प्रेरित करने के लिए यह पल सबसे मुफीद रहता है और लोग मेरी बातों को सुनकर प्रेरित भी हो जाते हैं। जब किसी से सत्कर्म के बारे में पूछो तो वह निरुत्तर हो जाता है, ऐसे में उसे देहदान को सबसे बड़ा सत्कर्म समझाना आसान होता है। क्योंकि एक शरीर जब मेडिकल कालेज को दान में मिलता है, तो दो नेत्रहीनों को रोशनी मिल जाती है, किसी जरूरतमंद रोगी को किडनी मिलने जान बचती है, इसके अलावा कई अंग ऐसे होते हैं जो किसी न किसी तरह से दूसरों के काम आकर उसे नया जीवन दे जाते हैं।

आज डाक्टर जिन्हें भगवान का दूसरा रूप समझा जाता है, उन्हें बेहतर चिकित्सक बनाने में पढ़ाई के समय दान में दिया गया शरीर का ही सबसे अहम योगदान होता है। पुरातन काल में संत महात्मा जल समाधि भी शायद इसलिए ही लेते रहे होंगे कि उनका शरीर जलीय जीव जंतुओं के पेट भरने में काम आ जाए यानि मरणोपरांत भी शरीर किसी जीव के काम ही आए। संत महात्माओं की यह सोच कहीं न कहीं देहदान के लिए प्रेरित करती है, जरूरत है ताे समझने की।

केजीएमयू और गोरखपुर एम्स तक पहुंचाए पार्थिव शरीर

मनोज बताते हैं कि समाज की आस्था को बदलते हुए उन्होंने 2006 में कानपुर देहात डेरापुर से 21 वर्षीय बउआ दीक्षित का प्रथम देहदान कराकर कारवां आगे बढ़ाया। पूरे प्रदेश में अबतक तीन हजार से अधिक लोगो को देहदान का संकल्प पत्र भरवा चुके हैं और 233 मृत देह मेडिकल कालेजों को दान कराई जा चुकी हैं। इसमें जीएसवीएम मेडिकल कालेज समेत गोरखपुर एम्स में दो, प्रयागराज में 24, अगरा में एक, अयोध्या में तीन, केजीएमयू लखनऊ में 34 और अंबेडकरनगर में तीन पार्थिव शरीर पहुंचा चुके हैं। इस काम के लिए उनका मोबाइल फोन हमेशा जागता रहता है, आधी रात भी अगर फोन आता है तो वह तुरंत निकल पड़ते हैं। इस काम में उनकी पत्नी माधवी भी पूरा सहयोग करती है और कई वह पार्थिव शरीर मेडिकल कालेज पहुंचाने जा चुकी हैं।

श्मशान घाट पर स्थापित किए अस्थि कलश बैंक

मनोज सेंगर कानपुर के पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने भैरव घाट, बिठूर घाट और महाराजपुर के ड्योढ़ी घाट पर अस्थि कलश बैंक स्थापित किए हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने देखा कि अंत्येष्टि के बाद लोग श्मशान घाट पर काम करने वालों को अस्थि कलश सौंपकर चले जाते थे और कुछ दिन बाद उन्हें प्रयागराज या हरिद्वार में विसर्जित करने के लिए लेने आते थे। श्मशान घाट पर काम करने वाले ये अस्थि कलश एक कोठरी में  बेतरतीब ढंग से लापरवाही से डाल देते थे और बाद में लेने वाले को अपना कलश कठिनाई से मिलता था और कई बार तो बदल भी जाता था। इसे देखते हुए उन्होंने वर्ष 2014 में सबसे पहले भैरव घाट पर विद्युत शव दह गृह पर अस्थि कलश बैंक स्थापित किया था, जिसमें अब करीब सौ लाकर हैं। ये निशुल्क सुविधा कोरोना काल में लोगों के लिए सर्वाधिक उपयोगी साबित हुई है। इसके साथ ही मां गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अस्थियों का भू-विसर्जन कराते हैं, जिसके लिए समय-समय पर सामूहिक कार्यक्रम भी करते हैं।

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ कर रहे जागरूक

मनोज सेंगर कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ भी लोगों को जागरूक कर रहे हैं। इसके लिए अक्सर नुक्कड़ नाटक कराते रहते हैं तो जागरूकता रैली और कैंडिल मार्च का भी आयोजन कराते हैं। सबसे अहम कदम उन्होंने शादी में आठवें वचन के रूप में उठाया है, वह जिस किसी भी शादी में जाते हैं वहां सात फेरों के समय वर-वधू को कन्या भ्रूण हत्या न करने का आठवां वचन भी दिलवाते हैं। इसके साथ अपने तर्पण अभियान में भी इस वर्ष से अजन्मी बेटियों के लिए मंगलामुखी समाज से पितृ पक्ष में तर्पण कराया, जिसमें मंगलामुखी काजल व किरण शामिल हुईं।

तर्पण में महिलाओं को तरजीह दी

मनोज सेंगर ने पितृ पक्ष के समय तर्पण के लिए महिलाओं की अगुवाकारी को बढ़ाया है। उनका कहना है कि प्राचीन काल में महिलाएं भी पूर्वजों का तर्पण करती थीं तो आज भी उन्हें आगे आना चाहिये। वह बताते हैं कि वर्ष 2011 से उन्होंने मुहिम छेड़ी थी, जो आज भी जारी है। वह प्रतिवर्ष पितृ पक्ष में प्रथम रविवार को सुबह 10 से 12 बजे के बीच गंगा नदी किनारे सरसैय्या घाट पर तर्पण कार्यक्रम का आयोजन करते हैं। इसमें नगर की प्रतिष्ठित महिलाओं को आमंत्रित करके पंडितों की मौजूदगी में संपूर्ण संस्कार विधि के तहत तर्पण कराते हैं। स्व. अटल विहारी वाजपेयी की पौत्री भी शामिल हो चुकी हैं।

शुरू किया जल मंदिर अभियान

मनोज बताते हैं कि हाल ही में जल मंदिर अभियान शुरू किया है। पहले सेठ, व्यापारी या जमींदार सड़क किनारे प्याऊ का इंतजाम कराते थे या छायादार जगह पर ठंडे पानी से भरे घड़े रखवाते थे, जो आज के समय में करीब-करीब बंद हो गई है। गरीबों, राहगीरों समेत अन्य लोगों को भीषण गर्मी के समय पीने का पानी नसीब नहीं हो पाता है। ऐसे में शहरी व ग्रामीण क्षेत्र में प्रमुख जगहों पर जल मंदिर अभियान शुरू किया है, समाज के लोगों की मदद से वाटर कूलर लगवाने का सिलसिला चल रहा है।

कई बार हुए सम्मानित अब पद्मश्री के लिए नाम

समाज में सराहनीय कार्य करने की वजह से मनोज सेंगर कई सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। शहर में समाज सेवा में अग्रसर मनोज सेंगर का नाम पद्मश्री के लिए नामांकित हुआ है। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए गृह मंत्रालय द्वारा पद्मश्री के लिए आवेदन स्वीकार कर लिया गया है। उन्हें 2009 में जी न्यूज उत्तर प्रदेश द्वारा अवध सम्मान, 2007 में केंद्रीय गृहराज्यमंत्री की ओर से सेवा रत्न सम्मान, राज्यपाल राम नाईक द्वारा संस्कार रत्न सम्मान, गुजरात के राज्यपाल द्वारा 2009 में डा. बृजलाल वर्मा अवार्ड, रोटरी क्लब द्वारा डा गौरहरी सिंघानिया सम्मान तथा इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड से नवाजा है।

Edited By: Abhishek Agnihotri