कानपुर, [राजीव द्विवेदी]। कानपुर शहर में राजनीतिक गतिविधियों और हलचल जो किन्हीं वजह से सुर्खियां नहीं बन पाती हैं, ऐसी ही चर्चाओं को चुटीले अंदाज में हर सप्ताह लेकर आता है शहरनामा कॉलम...। तो आइए देखते हैं इस बार क्या बता रहा है शहरनामा।

सत्ता के संस्कारों का परिवर्तन

सत्ता में पनपने वाले एब से भगवा दल भी अछूता नहीं रहा, इसकी बानगी हाल में एक जन्मदिन की पार्टी के दौरान हुए उपद्रव में दिखी। भगवाधारियों का आपराधिक इतिहास सामने आने से हैरान आम शहरी खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। संघ के संस्कारों में पले-बढ़े दल के भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और भू-माफिया के हमदर्द सिस्टम में परिवर्तन के वादे पर बंपर बहुमत का जनादेश देने वाले अब अचंभित हैं। मेहमान हिस्ट्रीशीटर को छुड़ाने वालों के चेहरों से पुलिस ने मीडिया के दबाव में नकाब नोंचा तो पार्टी के बड़े नेताओं के अक्स भी सामने आ गए। अब लोगों को पता चल रहा है कि किस तरह बड़े ओहदों पर बैठे नेताओं ने जरायमपेशा दबंगों को पार्टी में पद-प्रतिष्ठा दिलाई। ऐन चुनाव से पहले पार्टी की साख को लगे दाग के बाद भी कार्यालय के एक हिस्से पर चहेते दबंग पदाधिकारी के कब्जे को ओहदेदार नजरंदाज किए हैं।

माननीय को क्यों लगी मिर्ची

जन्मदिन की पार्टी में संस्कारों वाले दल के नेताओं के बेनकाब होने पर मुख्य विपक्षी दल के नेता हमलावर हो गए। कभी उनकी सरकार के खिलाफ परिवर्तन का नारा देकर सत्ता तक पहुंचे भगवा दल के नेताओं का क्राइम कनेक्शन सामने आते ही तंज उनके बयानों में झलके। अब तक रहे अजेय माननीय को लगता है, भगवा दल के नेता उस बिल्ली से हैं जो दूध पीते वक्त आंख बंद करके समझती है, उसका कृत्य कोई नहीं देख रहा। उनका दावा है, लोग सत्तादल के नेताओं की हकीकत जान चुके हैं। पहली बार माननीय बने मुख्य विपक्षी दल के ही नेताजी के स्वर में पुलिस के प्रति तल्खी ज्यादा है। सुपाड़ी पुलिङ्क्षसग जैसे उनके शब्द वैसे ही हैं जो भगवा दल से बेदखल होकर पुलिस के मेहमान बने नेताजी के हैं। माननीय को पुलिस की कार्रवाई पर मिर्ची क्यों लगी, इसकी चुगली इंटरनेट मीडिया पर वायरल तस्वीरों ने कर दी।

श्रेय की सियासत

पंचायत चुनाव में रुसवा हुए भगवा दल के नेता जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर पार्टी के सदस्य को बैठाकर सरकार-संगठन के बड़े नेताओं के सामने नंबर बढ़ाने की कोशिश में हैं। हालांकि समाजवादियों के संख्या बल के आगे यह दिवास्वप्न जैसा लगता है। अध्यक्षी का दांव किस पर लगे, ये श्रेय की सियासत के चलते अभी तक फाइनल नहीं हो सका। सरकार में ओहदेदार और युवा माननीय की जुगलबंदी से लगा कि शायद पार्टी के सदस्यों का बहुमत उनके खेमे में रहेगा। ओहदेदार की अध्यक्षी का श्रेय लेने की कोशिश देख माननीय समर्थक सदस्यों संग छिटक गए। ओहदेदार को यह नागवार गुजरा। अब माननीय को सबक सिखाने के लिए प्रतिद्वंद्वी गुट के सदस्य की पैरवी में लगे हैं ताकि उसे संगठन से अध्यक्षी का टिकट मिल जाए। अकेले पड़े माननीय भी कोई और श्रेय न ले जा पाए उसके लिए जी-जान से अपने समर्थक सदस्य की पैरवी में लगे हैं।

संगठन नहीं, सेल्फ ब्रांडिग

दीदी के दल के नेता संगठन में फिर से प्राण फूंकने की जद्दोजहद में लगे हैं। लॉकडाउन के दौरान सत्ता से संघर्ष के तेवर दिखाए। दूसरी लहर के पीक पर होने के दौरान दुबके रहे तमाम दलों की तरह दीदी के दल के नेता भी गायब रहे। आफत टलने लगी, तब दीदी के फरमान पर सभी कोरोना पीडि़तों की सेवा के लिए प्रकट हुए तो उनके बीच खुद की ब्रांङ्क्षडग की होड़ लग गई। शहर के दोनों संगठनों के नेता कभी खाना बांटते तो कभी मास्क और सैनिटाइजर। होड़ इस बात की थी कि महफिल कौन लूटेगा। वहीं ग्रामीण इकाई के नेता पंचायत चुनाव में हारने वालों को सत्तादल का समर्थक होने का दावा करके संगठन में शामिल कराने की होड़ में लग गए। तीनों को चुनाव टिकट की दावेदारी मजबूत करता देखकर अब पुराने पदाधिकारी इन तीनों नेताओं को घेरने की रणनीति के लिए गुपचुप बैठकें कर रहे हैं।

Edited By: Abhishek Agnihotri