जितेंद्र शर्मा, कानपुर। कानपुर की धरती को हिंदी का 'आंगन' कहें तो गलत न होगा। इसकी धरती से देश को समृद्ध हिंदी साहित्य उपलब्ध हुआ और शहर के कलमकारों का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। देश के पहले हिंदी अखबार 'उदन्त मार्तण्ड' की बात हो या कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की। आजादी के समर में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका की बात हो कोई महत्वपूर्ण प्रसंग, नाता कानपुर से जुड़ा जरूर मिलेगा। आइए एक विश्व हिंदी दिवस पर आपको कानपुर से जुड़े साहित्य की ओर ले चलते हैं...।

देववाणी से हिंदी की ओर चला कानपुर

कानपुर में साहित्य सृजन की शुरुआत का सबसे पहला संदर्भ पौराणिक कथाओं से मिलता है। उल्लेख है कि माता सीता ने आदि कानपुर कहे जाने वाले बिठूर में ही महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश को जन्म दिया, उनका लालन-पालन किया। यहीं पर महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की, जो कि विश्व साहित्य की अनमोल धरोहर है। इस धरती पर साहित्य सृजन का सिलसिला वहीं से शुरू हुआ माना जाता है।

कलम ने लिखे क्रांति के बोल

हिंदी साहित्य सृजन की भूमि यह शहर बना तो इसमें यहां हुई क्रांति की भी अहम भूमिका है। कोलकाता को राजधानी बनाने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी ने गंगा तट पर बसे कानपुर को व्यापारिक केंद्र बनाया था। अंग्रेजी फौज यहां रहती थी और जनता पर अत्याचार करती थी। 1857 की क्रांति का विस्फोट यहां से हुआ। बिठूर के नानाराव पेशवा, अजीमुल्ला खां, अजीजन बाई सहित कई ऐसे चरित्र हुए, जिन्होंने कलम के सिपाहियों को आकर्षित किया। उन्हीं के प्रभाव से प्रताप अखबार के जरिये गणेश शंकर विद्यार्थी ने तेजस्वी हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत कानपुर से की। महान क्रांतिकारी भगत सिंह भी यहां रहकर छद्म नाम से प्रताप अखबार में लिखते थे।

धनपत राय बने मुंशी प्रेमचंद

साहित्यकार बताते हैं कि मुंशी प्रेमचंद इलाहाबाद में नौकरी करते हुए उर्दू में धनपत राय के नाम से कहानियां लिखा करते थे। फिर उनका तबादला डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल के रूप में कानपुर हुआ। वह मारवाड़ी इंटर कॉलेज के प्रधानाध्यापक बने। यहां मेस्टन रोड पर रहने वाले उनके परम मित्र मुंशी दयानारायण निगम 'जमाना'पत्रिका निकालते थे। यहां प्रेमचंद ने मिल, कारखाने देखे। वहां मजदूरों की स्थिति, ट्रेड यूनियन के आंदोलन देखे और उस पर हिंदी में लिखना शुरू किया। बताते हैं कि यहीं पर उन पर गबन का आरोप लगा। झूठे आरोप से ही आहत होकर उन्होंने प्रसिद्ध उपन्यास 'गबन' लिखा। कानपुर में हुई साहित्य साधना ने ही उर्दू में लिखने वाले मुंशी प्रेमचंद को हिंदी का कथा सम्राट बना दिया। उसी दौर में बड़े साहित्यकार के रूप में विश्वम्भर नाथ शर्मा 'कौशिक' मशहूर हो गए थे। वह प्रेमचंद से कुछ वरिष्ठ थे। उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिका चांद और सुधा में प्रेमचंद और कौशिक की कहानियां सर्वाधिक प्रकाशित होती थीं।

माखनलाल चतुर्वेदी और महावीर प्रसाद द्विवेदी की भी कर्मस्थली

माखनलाल चतुर्वेदी ने मप्र के खंडवा से प्रभा नाम की पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। कुछ समय बाद ही वहां संसाधनों की कमी होने लगी। लिहाजा, उन्हें भी कानपुर की धरती ने आकर्षित किया और वह यहां चले आए। पत्रिका यहां से शुरू हुई और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' ने उसका संपादन किया। इसी तरह महान साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी को कानपुर से विशेष लगाव रहा। इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'सरस्वती' का उन्हें संपादक बनाया गया तो उन्होंने रेलवे की नौकरी छोड़ दी। शर्त रख दी कि वह संपादन करेंगे एक ही शर्त पर। कानपुर में रहकर लेखन करेंगे और यहां से इलाहाबाद लेख भेजेंगे। फिर वह यहीं जूही आकर रहे और कानपुर के कई लेखकों को प्रोत्साहित भी किया। भगवती प्रसाद बाजपेयी ने उत्तर भारत के सामाजिक ताने-बाने और औद्योगिक परिवेश से उपजने वाले मुद्दों को अपनी रचना में उठाया। उसी दौर में प्रताप नारायण श्रीवास्तव ने भी कई ऐतिहासिक उपन्यास लिखे, जिनमें 'बेकसी का मजार' बहुत चर्चित हुआ। पंडित प्रताप नारायण मिश्र हिंदी के आदि व्यंग्यकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने कानपुर से ही 'ब्राह्मण' नामक पत्रिका भी निकाली।

कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार पारित हुए हिंदी में प्रस्ताव

कांग्रेस के अधिवेशनों में हमेशा अंग्रेजी में ही प्रस्ताव पारित होते थे। 1925 में कानपुर में अधिवेशन हुआ। उसमें महात्मा गांधी भी आए थे। तब पहली बार कांग्रेस अधिवेशन के प्रस्ताव हिंदी में पारित हुए। इसी अधिवेशन में नर्वल निवासी श्यामलाल गुप्त पार्षद द्वारा रचित झंडा गीत 'झंडा ऊंचा रहे हमारा... को मान्यता मिली।

अटल और नीरज ने भी बहाई काव्यधारा

हाल ही में दुनिया से विदा हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और महाकवि गोपाल दास नीरज ने भी हिंदी काव्यधारा कानपुर से ही बहाई। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने डीएवी कॉलेज में पढ़ते हुए अपनी पहली कविता 15 अगस्त 1947 को पढ़ी थी। इसी शहर में पढ़े-बढ़े प्रख्यात गीतकार गोपालदास नीरज ने गीत का सफर शुरू किया तो दुनिया में उनके शृंगार रस की सुगंध फैल गई। उनके बाद गद्य में शील जी का नाम हुआ। उन्होंने कहानी, नाटक और क्रांति गीत की रचना की। नीरज की गीत परंपरा को सिंदूर, राही और डॉ. उपेंद्र ने आगे बढ़ाया।

गिरिराज किशोर और प्रियंवद ने बढ़ाया माटी का मान

वर्तमान दौर में सबसे वरिष्ठ और सशक्त साहित्यकारों में कथाकार पद्मश्री गिरिराज किशोर और प्रियंवद का नाम सम्मान से लिया जाता है। इलाहाबाद में नौकरी करने वाले गिरिराज किशोर असिस्टेंट एम्प्लॉयमेंट ऑफिसर बनकर कानपुर आए। यहां कर्मचारियों की स्थिति पर ही उन्होंने उपन्यास 'चिडिय़ाघर' लिखा। उनकी कहानियां धर्मयुग और सारिका जैसी पत्रिकाओं में छपने लगीं। उनके द्वारा लिखा गया उपन्यास 'पहला गिरमिटिया' काफी लोकप्रिय हुआ और उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। इसी तरह कथा संग्रह 'खरगोश' के लेखक प्रियंवद के उपन्यासों पर फिल्में भी बनीं। ङ्क्षहदी साहित्य सेवा का सिलसिला चलता रहा। रिजर्व बैंक में ट्रेड यूनियन से जुड़कर आंदोलन करने वाले कामतानाथ ने कहानी लेखन शुरू किया। फिर औद्योगिक परिवेश ने ही शहर को राजेंद्र राव, श्रीनाथ और सुनील कौशिक जैसे साहित्यकार दिए। कहानीकारों में ललित मोहन अवस्थी, सुशील शुक्ल, प्रकाश बाथम और हृषिकेश भी उल्लेखनीय नाम हुए। सुमित अय्यर और अमरीक सिंह दीप भी इसी समय के चमकते मोती हैं।

Posted By: Abhishek

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