कानपुर, [दिग्विजय सिंह]। कानपुर शहर में प्रशासनिक दफ्तरों में रोजाना कई चर्चाएं सामने आती हैं लेकिन सुर्खियां नहीं बन पाती हैं। ऐसी ही पर्दे के पीछे की हकीकत को चुटीले अंदाज में लेकर आता है दाखिल दफ्तर कॉलम..। आइए देखते हैं पिछले सप्ताह दफ्तरों में किन बातों की हलचल बनी रही...।

  • सुख के सब साथी दु:ख में न कोई

औद्योगिक विकास विभाग से जुड़े के साहब अपने दफ्तर में बैठकर सुख के सब साथी, दुख के न कोई... गीत गुनगुना रहे थे तभी चपरासी साहब के लिए चाय लेकर आ गया। उसे देखकर साहब चुप हो गए। चपरासी ने कहा साहब क्या हुआ यह दु:ख भरे नगमे काहे गुनगुना रहे हैं। साहब ने कहा यार नोएडा में था तो दफ्तर और घर दोनों जगह पर दरबार लगता था। लोग सुबह से शाम तक जी-हुजूरी करते थे लेकिन आज तो कोई पूछने वाला भी नहीं है। जो पहले कहते थे साहब आपके एक इशारे पर चांद-तारे तोड़ लाऊंगा वही लोग आजकल कॉल तक रिसीव नहीं करते। चपरासी ने कहा साहब हमारे मिश्रा जी को ही देख लें कभी जलवा था आज कोई नाम लेवा नहीं है। साहब के साथ बैठे कुछ उनके अपने उनकी बातों को सुनकर भौचक jg गए। उनमें से एक ने कहा चिंता न करो, वक्त बदलेगा।

  •  अरे कफन में जेब नहीं होती

उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) के सीईओ ने उद्यमियों को राहत देने के लिए मुख्यालय पर तैनात अधिकारियों के अधिकारों में कटौती कर दी। अब बड़े से बड़ा काम क्षेत्रीय प्रबंधकों के माध्यम से ही हो जाएगा। सीईओ के फैसले से मुख्यालय पर तैनात एक अधिकारी महोदय कुछ ज्यादा ही परेशान हैं। वे अपने साहब को भी कोस रहे हैं। उनके खास अधिकारी ने साहब से कहा पार्टी तो दो अब काम कम हो गया है। साहब हंसते हुए बोले क्या पार्टी दूं यार, अब तो अधिकार बचे नहीं हैं। यही स्थिति रही तो कुछ दिन में मुख्यालय में कोई आवंटी आएगा ही नहीं। अभी तक तो लोग आते थे और बड़ी गर्मजोशी से नमस्ते करते थे, अब कौन करेगा। अधिकारी ने उनसे कहा अरे भाई, कफन में जेब नहीं होती। मेरी तरह मस्त रहो तो स्वस्थ भी रहोगे। अरे भाई लोग आएंगे नहीं तो कोरोना से भी बचे रहोगे।

  • चलो, कोरोना ने बचा लिया

शादी अनुदान के फर्जीवाड़े में एक दर्जन से अधिक लेखपाल और आधा दर्जन अधिकारी फंस रहे हैं। जिन दो हजार आवेदनकर्ताओं को शादी अनुदान योजना के तहत वित्तीय मदद दी गई है। उनमें से दो सौ से अधिक अपात्र मिल चुके हैं। अभी जांच सिर्फ आठ सौ फार्मों की हुई है। अपात्रों की संख्या बढ़ेगी और लेखपालों के साथ ही एसडीएम और तहसीलदार भी जांच के दायरे में हैं। जांच अब रुक गई है क्योंकि कोरोना संक्रमण बढऩे के बाद अफसरों को वहां तैनात कर दिया गया है। फाइल आलमारी में बंद होने से वे अफसर खुश हैं जो फंस रहे थे। पिछले दिनों तहसील में कुछ लेखपाल बैठे चाय पी रहे थे और किसी बात पर ठहाके लगा रहे थे तभी एक लिपिक ने उनसे पूछ लिया कि भाई ठहाके किस बात के हैं तो एक लेखपाल ने कहा कि अच्छा हुआ कोरोना आ गया नहीं तो फंस जाते।

  • अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे

कोरोना संक्रमण की रोकथाम में लगे एक विभाग के अधिकारी महोदय आजकल किसी का फोन नहीं उठाते। जिले के आला अधिकारी हों या फिर मंडल स्तर के अधिकारी, सभी साहब की कार्यशैली से परेशान हैं। साहब हर किसी से खुद को संत बताते हैं और ईमानदारी का बखान करते हैं। जो भी उनके पास जाता है पहले उसे वे कर्तव्यनिष्ठा का खूब पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन खुद कर्तव्य का निर्वाह नहीं करते। इस कारण लोग उन्हें ढोंगी बाबा कहने लगे हैं। साहब इसलिए किसी की नहीं सुनते क्योंकि उनके विरुद्ध कार्रवाई नहीं होती। जिले के कुछ विधायक उनके विरुद्ध मोर्चा भी खोल चुके हैं और मुख्यमंत्री से उनकी शिकायत भी कर चुके हैं। कोरोना पीडि़त लोगों का भी वह नहीं उठाते। एक अस्पताल में ऐसी घटना घटी कि उन्हें जलालत का सामना करना पड़ा। अब लोग मजे ले रहे हैं और कह रहे हैं अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे...।