जागरण संवाददाता, कानपुर :

केंद्रीय मोटरयान (संशोधित) अधिनियम 2019 लागू होने के बाद लोगों में जागरूकता तो आई है और वे हेलमेट भी लगाने लगे हैं। मगर, इतना ही काफी नहीं है। आपका हेलमेट मजबूत, सुरक्षित और आइएसआइ मार्का होना चाहिए। कोई भी सस्ता और आइएसआइ मार्का के बिना का हेलमेट पहनकर अगर यह सोचते हैं कि चालान नहीं कटेगा तो यह सोच गलत है। मानक अनुरूप हेलमेट न होने पर भी चालान कट सकता है।

ट्रैफिक इंस्पेक्टर अनिल सिंह के मुताबिक एमवी एक्ट की धारा 129 के तहत दोपहिया वाहन चालकों को केवल आइएसआइ मार्क वाला हेलमेट ही लगाने के लिए कहा गया है। किसी चालक ने बिना आइएसआइ मार्क का हेलमेट पहना है तो उसका भी चालान बगैर हेलमेट वाले चालक की तरह किया जा सकता है। चालक ने अगर हेलमेट का फीता नहीं लगाया है तो भी उसका चालान किया जा सकता है। जल्द ही नियम सख्त कर हेलमेट भी चेक किए जाएंगे। आइएसआइ मार्क का हेलमेट न मिलने पर चालान किया जाएगा।

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जानलेवा हो सकता सस्ता हेलमेट

जुर्माने से बचने के लिए तमाम दोपहिया सवार बिना आइएसआइ मार्क के सस्ते हेलमेट खरीदने लगे हैं। 100-150 रुपये में चौराहों पर बिक रहे ये हेलमेट हादसा होने पर जानलेवा हो सकते हैं। टूटने पर इन हेलमेट के फाइबर के टुकड़े चालक के सिर में घुसने की आशका रहती है।

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धड़ल्ले से बिक रहे खराब गुणवत्ता के हेलमेट

शहर में खराब गुणवत्ता वाले हेलमेट तमाम चौराहों व तिराहों पर बिक रहे हैं। आज तक इन हेलमेट बेचने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई। ट्रैफिक पुलिस के मुताबिक हेलमेट पर आइएसआइ 4151 स्टैंडर्ड लिखा होता है, वह सुरक्षित है। हेलमेट में गले और फीते के बीच में दो उंगली की जगह भी जरूर होनी चाहिए।

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हेलमेट न पहनने से गई थी ठेकेदार की जान

बिधनू : सात वर्ष पूर्व बिधनू में ठेकेदार भगवान गुप्ता की जान हेलमेट न होने के कारण चली गई थी। आज भी उनका परिवार हादसे के बाद से उबर नहीं सका है। खेरसा गांव निवासी मंजू ने बताया कि 45 वर्षीय भगवान गुप्ता जल निगम में ठेकेदारी करते थे। 26 मार्च 2012 की रात आठ बजे वह बाइक से जलनिगम मुख्य कार्यालय से घर लौट रहे थे। रमईपुर में पीछे से आ रहे ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी। वह सिर के बल सड़क पर जा गिरे। हेलमेट न होने की वजह से सिर पर गंभीर चोट आई और उनकी मौत हो गई थी। मंजू ने बताया कि आज परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ है। घटना के समय बेटा नयन 13 वर्ष और बेटी आरती 11 वर्ष की थी। गृहस्थी चलाना मुश्किल हो गया। जमा पूंजी खर्च कर दोनों को पढ़ाया। बेटा अब बीएससी द्वितीय वर्ष और बेटी बीएससी प्रथम वर्ष में है। सात वर्ष बाद भी मुआवजा तक नहीं मिला। वह गृहस्थी का सामान बेचकर गुजर बसर कर रही हैं।

Posted By: Jagran

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