आठ अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन को ‘भारत छोड़ो’ के सशक्त नारे के साथ चुनौती दी थी। उन्होंने भारत के लोगों से ‘करो या मरो’ का ऐतिहासिक आह्वान किया था। भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव रखते हुए उन्होंने जो भाषण दिया था, वह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक आंदोलन के अंतिम शंखनाद के रूप में स्थापित हुआ। पढ़िए वह ऐतिहासिक भाषण...

प्रस्ताव पर चर्चा शुरू करने से पहले मैं दो बातों को साफ-साफ समझाना चाहता हूं और उन बातों को मैं हम सभी के लिए महत्वपूर्ण भी मानता हूं। मैं चाहता हूं कि आप सब उन दो बातों को मेरे नजरिए से ही देखें, क्योंकि यदि आपने उन दो बातों को अपना लिया तो हमेशा आनंदित रहेंगे।

कई लोग मुझसे यह पूछते हैं कि क्या मैं वही इंसान हूं जो वर्ष 1920 में हुआ करता था और क्या मुझमें कोई बदलाव आया है? मैं जल्द ही आपको इस बात का आश्वासन दिलाऊंगा कि मैं वही मोहनदास गांधी हूं, जैसा 1920 में था। मैंने आत्मसम्मान को नहीं बदला है।

आज भी मैं हिंसा से उतनी ही नफरत करता हूं जितनी उस समय करता था। मेरे वर्तमान प्रस्ताव और पहले के लेख और स्वभाव में कोई विरोधाभास नहीं है। वर्तमान जैसे मौके हर किसी की जिंदगी में नहीं आते, लेकिन कभी-कभी एक-आध की जिंदगी में जरूर आते हैं।

मैं चाहता हूं कि आप सभी इस बात को जानें कि अहिंसा से ज्यादा शुद्ध और कुछ नहीं है, इस बात को मैं आज कह रहा हूं और अहिंसा के मार्ग पर चल भी रहा हूं। हमारी कार्यकारी समिति का बनाया हुआ प्रस्ताव भी अहिंसा पर ही आधारित है और हमारे आंदोलन के सभी तत्व भी अहिंसा पर ही आधारित होंगे। यदि आपमें से किसी को भी अहिंसा पर भरोसा नहीं है तो कृपया करके इस प्रस्ताव के लिए वोट न करे।

मैं आज आपको अपनी बात साफ-साफ बताना चाहता हूं। भगवान ने मुझे अहिंसा के रूप में एक मूल्यवान हथियार दिया है। मैं और मेरी अहिंसा ही आज हमारा रास्ता है। वर्तमान समय में जहां धरती हिंसा की आग में झुलस चुकी है और लोग मुक्ति के लिए रो रहे हैं, मैं भी ईश्वर द्वारा दिए गए ज्ञान का उपयोग करने में असफल रहा हूं।

मैं उनके द्वारा दिए गए इस उपहार को जल्दी समझ नहीं पाया, लेकिन अब मुझे अहिंसा के मार्ग पर चलना ही होगा। हमारी यात्रा ताकत पाने के लिए नहीं बल्कि भारत की स्वतंत्रता की अहिंसात्मक लड़ाई के लिए है। हिंसात्मक यात्रा में तानाशाही की संभावनाएं ज्यादा होती हैं जबकि अहिंसा में तानाशाही के लिए कोई जगह ही नहीं है।

एक अहिंसात्मक सैनिक खुद के लिए कोई लोभ नहीं करता, वह केवल देश की स्वतंत्रता के लिए ही लड़ता है। कांग्रेस इस बात को लेकर बेफिक्र है कि स्वतंत्रता के बाद कौन शासन करेगा। स्वतंत्रता के बाद जो भी ताकत आएगी, उसका संबंध भारत की जनता से होगा और भारत की जनता ही यह निश्चित करेगी कि उन्हें यह देश किसे सौंपना है और चुनने के बाद भारत की जनता को भी उसके अनुरूप ही चलना होगा।

कांग्रेस सभी समुदायों को एक करना चाहती है, न कि उनमें फूट डालकर विभाजन करना चाहती है। मैं जानता हूं कि अहिंसा परिपूर्ण नहीं है और ये भी जानता हूं कि हम अहिंसा के विचारों से फिलहाल कोसों दूर हैं। मुझे पूरा विश्वास है, छोटे-छोटे काम करने से ही बड़े-बड़े कामों को अंजाम दिया जा सकता है।

ये सब इसलिए होता है क्योंकि हमारे संघर्षों को देखकर अंतत: ईश्वर भी हमारी सहायता करने को तैयार हो जाते हैं। मेरा इस बात पर भरोसा है कि दुनिया के इतिहास में हमसे बढ़कर और किसी देश ने लोकतांत्रिक स्वतंत्रता पाने के लिए संघर्ष न किया होगा।

जिस लोकतंत्र का मैंने विचार कर रखा है, उसका निर्माण अहिंसा से होगा, जहां हर किसी के पास समान स्वतंत्रता और अधिकार होंगे। हर कोई खुद का शिक्षक होगा और इसी लोकतंत्र के निर्माण के लिए आज मैं आपको आमंत्रित करने आया हूं। एक बार यदि आपने इस बात को समझ लिया तब आप हिंदू और मुस्लिम के भेदभाव को भूल जाएंगे। तब आप भारतीय बनकर खुद का विचार रखेंगे और स्वतंत्रता के संघर्ष में साथ देंगे।

अब प्रश्न ब्रिटिशों के प्रति आपके रवैये का है। मैंने देखा है कि कुछ लोगों में ब्रिटिशों के प्रति नफरत का रवैया है। कुछ लोगों का कहना है कि वे ब्रिटिशों के व्यवहार से चिढ़ चुके हैं। कुछ लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद और ब्रिटिश लोगों के बीच के अंतर को भूल चुके हैं। उन लोगों के लिए दोनों ही एक समान हैं।

उनकी यह घृणा जापानियों को आमंत्रित कर रही है। यह काफी खतरनाक होगा। इसका मतलब है कि वे एक गुलामी की दूसरी गुलामी से अदला-बदली करेंगे। हमें इस भावना को दिल-दिमाग से निकाल देना चाहिए। हमें ब्रिटिश लोगों से नहीं बल्कि उनके साम्राज्यवाद से लड़ना है। मैं जानता हूं कि ब्रिटिश सरकार हमसे हमारी स्वतंत्रता नहीं छीन सकती, लेकिन इसके लिए हमें एकजुट होना होगा। इसके लिए हमें खुद को घृणा से दूर रखना चाहिए।

हम हमारे महापुरुषों के बलिदानों को नहीं भूल सकते। खुद के लिए बोलते हुए, मैं कहना चाहूंगा कि मैंने कभी घृणा का अनुभव नहीं किया। बल्कि मैं समझता हूं कि मैं ब्रिटिशों के सबसे गहरे मित्रों में से एक हूं। आज उनके अविचलित होने का एक ही कारण है, मेरी गहरी दोस्ती।

मेरे दृष्टिकोण से, फिलहाल वे नरक की कगार पर बैठे हुए हैं। यह मेरा कर्तव्य होगा कि मैं उन्हें आने वाले खतरे की चुनौती दूं। इस समय जहां मैं जीवन के सबसे बड़े संघर्ष की शुरुआत कर रहा हूं, मैं नहीं चाहता कि किसी के भी मन में किसी के प्रति घृणा का निर्माण हो।

Edited By: Abhishek Agnihotri

जागरण फॉलो करें और रहे हर खबर से अपडेट