फतेहपुर, [गोविंद दुबे]। फतेहपुर से 12 किमी दूर उत्तर वाहनी गंगा के तट पर महर्षि भृगुमुनि ने तपस्या की थी, तभी से इसका नाम भृगुठौरा पड़ा। बाद में इसे भिटौरा के नाम से जाना जाने लगा। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार महर्षि भृगु ने यहां लंबे समय तक तपस्या की थी, भृगुठौरा के नाम से उनकी तपोस्थली आज भी लोगों के आस्था का केंद्र बनी है। यह भी मान्यता है कि देवता महर्षि भृगु की तपोस्थली की परिक्रमा करने आए थे। इसके बाद तो यह स्थान ऋषियों व मुनियों की तपोस्थली बन गया। घाट के किनारे प्राचीन मंदिर व ऋषियों की तपोस्थली में हजारों लोग हर अमावस्या व पूर्णिमा को माथा टेकने आते हैं।

यह भी प्रमाण मिलते हैं कि गंगा अपने बहाव क्षेत्र में मात्र हरिद्वार, काशी व भिटौरा में उत्तरवाहिनी हैं। दो दशक पहले संत विज्ञानानंद ने महर्षि भृगु की तपोस्थली में विशालकाय पक्का घाट निर्मित कराया। इस रमणीक स्थल में संत श्री की संदीपनी वेद पाठशाला चलती है। इस पाठशाला में सभी एक सैकड़ा से अधिक बच्चे वेदपाठ का अध्ययन करते है। आध्यात्मिक महत्व से परिपूर्ण से इस स्थान की प्राकृतिक सौंदर्यता को निहारने के लिए यूं तो हर रोज लोग पहुंचते हैं लेकिन अमावस्या व पूर्णिमा को शाम को गंगा आरती का सुरम्य दृश्य देखने के लिए भारी भीड़ जुटती है। घाट में भगवान शंकर की विशालकाय मूर्ति बीस साल पहले स्थापित गई थी, जिसमें अनवरत ओम नम: शिवाय का जाप चल रहा है। सावन के महीने में हर रोज इस मंदिर में दर्शन व पूजन के लिए भक्तों का रेला लगता है।

दिया जाता स्वच्छता का संदेश

अविरल गंगा, निर्मल गंगा का संदेश सबसे पहले भिटौरा के ओम घाट से गूंजा। स्वंयसेवकों के माध्यम से भक्तों द्वारा लाई गई निष्प्रोज्य पूजन सामाग्री एक जगह एकत्रित कर गंगा में डालने से रोका जाता है। साबुन लगाकर कोई स्नान नहीं कर सकता। घाट में पॉलीथिन का प्रयोग पिछले पांच साल वर्जित है।

पर्यटक स्थल का भेजा प्रस्ताव

ओम घाट के संचालक स्वामी विज्ञानानंद ने बताया कि भिटौरा को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दो साल पहले घाट आकर यहां पर गंगा दर्शन केंद्र व डाल्फिन संरक्षण केंद्र विकसित करने के प्रस्ताव पर मुहर लगाई थी। पर्यटन विभाग ने ओम घाट में महर्षि भृगु की बड़ी मूर्ति लगाने के साथ घाट में उच्चीकरण का प्रस्ताव तैयार किया है। 

Posted By: Abhishek

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