शशाक शेखर भारद्वाज, कानपुर: चंद्रशेखर आजाद (सीएसए) कृषि विश्वविद्यालय ने वायु प्रदूषण रोकने का उपाय खोजा है। वहा के प्लाट पैथोलॉजी विभाग ने खास तरह की मित्र फफूंद विकसित की है, जिसकी सहायता से कृषि अपशिष्ट को खाद के रूप में तबदील किया जा सकता है। इस प्रक्रिया से कृषि अपशिष्टों को जलाने से रोका जा सकेगा।

फसलों की कटाई के बाद उसके अवशेषों का निस्तारण सबसे बड़ी समस्या रहती है। इनमें मटर, गेहूं की पुआल, गन्ने की खोई, गेंहू-चने का भूसा आदि शामिल हैं। किसान खेतों में अगली बुआई को लेकर कृषि अपशिष्टों को जला देते हैं, जिससे वायुमंडल में काफी धुआ फैल जाता है। यह स्थिति काफी दिनों तक रह सकती है। धुएं का गुबार वायुमंडल के सबसे निचली परत में रहता है। जिसके चलते लोगों को सास लेने में दिक्कत होती है। डॉ. सुप्रिया दीक्षित और डॉ. शोभा त्रिवेदी की देखरेख में मित्र फफूंद पर काम चल रहा है।

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बायो कंट्रोल लैब में विकसित हुई फफूंद

ट्राइकोडरमा (फफूंद) की खास प्रजाति को बायो कंट्रोल लैब में विकसित किया गया है। इसकी खासियत है कि यह तीन से चार महीने में अपशिष्टों को खाद में बदल देती है। उस खाद को खेत में फैलाने से रोग भी दूर रहेंगे और जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ जाएगी।

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कचरे में किया जा रहा प्रयोग

कृषि विवि के विशेषज्ञों की मानें तो ट्राइकोडरमा को नगर के कार्बन युक्त कचरे में प्रयोग किया जाएगा। प्लास्टिक और पॉलीथिन में काम नहीं करेगा। घरों से निकलने वाले कचरे पर भी डाला जा रहा है। उसे सड़ाकर खाद के रूप में तैयार होने में बेहतर परिणाम सामने आए हैं।

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फूलों के कचरे ने दिया बेहतर परिणाम

मंदिरों से निकलने वाले फूलों पर मित्र फफूंद ने बेहतर परिणाम दिए हैं। उनसे खाद तैयार किया जा रहा है। किसानों के लिए बिना रुपये खर्च किए बेहतर खाद मिल सकेगी।

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मित्र फफूंद ने कृषि अवशेष की समस्या को दूर कर दिया है। किसान उन्हें नहीं जलाएंगे, जिससे वायु प्रदूषित होने से बच सकेगा। अब तक हुए सभी प्रयोग सफल रहे हैं। किसानों के लिए यह काफी मुफीद साबित होगा। '

- प्रो. वेद रतन, विभागाध्यक्ष, प्लाट पैथोलॉजी, सीएसए कृषि विवि

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