जागरण संवाददाता, कानपुर : लोकतंत्र का मतलब होता है जनता का शासन लेकिन जनता का वोट लेकर चंद लोग ही हमारी दशा और दिशा तय करते हैं। ऐसे में निजी स्वार्थ छोड़कर समस्याओं के खिलाफ आवाज उठा हमें लोकतंत्र का जनसहभागी बनना चाहिए। देश की तस्वीर खुद ब खुद बदल जाएगी। आज ले देकर अपना काम कराने की आदत हो गई है। मिलकर खड़े हो जाएं, घूस देना बंद करें तो भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। ये बातें जागरण विमर्श के दौरान 'लोकतंत्र में कैसे बढ़े जनता की भागीदारी' विषय पर बोलते हुए डीसी लॉ की पूर्व प्राचार्य डॉ. नंदिनी उपाध्याय ने कहीं।

उन्होंने लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि संविधान ने हमें समता, शिक्षा, मतदान समेत कई अधिकार दिए हैं लेकिन हम आज भी जाति, वर्ग और समुदाय में बंटे हैं। मतदान भी हम जाति और पार्टी प्रतिनिधि देखकर करते हैं। जनप्रतिनिधि और राजनीतिक पार्टियां इसी का फायदा उठाती हैं। हमें सोचना होगा कि जो जनप्रतिनिधि चुनाव के वक्त हमें तरह-तरह के प्रलोभन दे रहा है, वह जीतने के बाद अपने फायदे के लिए क्या-क्या करेगा। हम प्रतिनिधि के पास समस्याएं लेकर पहुंचते हैं तो हमें आश्वासन मिलता है। जनता ऐसे जनप्रतिनिधि के खिलाफ एनजीओ, समूह और संगठन बनाकर विचार विमर्श करे, फिर जनप्रतिनिधि से मिलकर उसे उसके वादे याद दिलाएं। जनप्रतिनिधि समस्याएं नहीं सुनता तो दोबारा उसे न चुनें। इसके लिए एकजुट होना होगा। उन्होंने अन्ना हजारे के आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा, बदलाव की मांग हुई तो सरकार तक हिल गई थी। लोकतंत्र में महिलाओं की सहभागिता का ही परिणाम है कि सरकार को उनकी तकलीफों पर घरेलू ¨हसा, दहेज प्रतिषेध जैसे अधिनियम बनाने पड़े। आरटीआइ का कानून भी जनता को सशक्त करने के लिए ही है। हम ही जागरूक नहीं होंगे तो कानून किताबी बनकर रह जाएगा। निर्भया कांड के बाद आवाज उठी तो बाल संरक्षण अधिनियम में संशोधन हुआ। बोलीं, हमें शिक्षा का अधिकार मिला है पर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा निम्नस्तर पर है। दुखद है कि चपरासी बनने के लिए भी शिक्षित होना जरूरी है लेकिन नेता बनने के लिए इस देश में अंगूठा टेक भी चलता है। जनता आवाज उठाएगी तो ये कानून भी बदलेंगे। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं, बड़े स्कूलों में 25 फीसद गरीब बच्चों को पढ़ाने का नियम है, पर इनका कितना पालन हो रहा है। जनआंदोलन होगा तो सब सुधरेगा। बदलने की ठान लेंगे तो जनता के आगे सरकार भी घुटने टेक देगी। सबसे बड़ी समस्या हमारा स्वार्थ है। कहा कि 'हमारा काम बने, दूसरा फंसे तो हमें क्या' वाली सोच को बदलना होगा। हम बदलने का इरादा कर लें तो विधायिका, कार्यपालिका सबको बदलना होगा और तभी लोकतंत्र में हमारी सच्ची सहभागिता होगी।

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