कानपुर, गौरव दीक्षित। पूर्व मंडलायुक्त और उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के चेयरमैन मोहम्मद इफ्तिखारुद्दीन को लेकर एसआइटी (विशेष जांच दल) जांच में बड़ा राजफाश हुआ है। एसआइटी ने अपनी जांच में पाया कि पूर्व मंडलायुक्त ने प्रदेश के आठ से ज्यादा जिलों में बड़ी संख्या में मतांतरण कराए। कई साक्ष्य एसआइटी के हाथ लगे हैं। हालांकि, जांच रिपोर्ट कई दिनों से शासन में लंबित है, ऐसे में सवाल उठ रहे हैं, आखिर सरकार इस मामले में कोई फैसला क्यों नहीं कर रही है।

पूर्व मंडलायुक्त पिछले दिनों उस वक्त चर्चाओं में आए थे, जब इंटरनेट मीडिया पर उनके कुछ वीडियो वायरल हुए थे, जिसमें वह धार्मिक कट्टरता की तकरीरें करते नजर आए। दावा किया गया कि कानपुर के मंडलायुक्त रहते अपने सरकारी आवास में उन्होंने यह तकरीरें की थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन ने महानिदेशक सीबीसीआइडी जीएल मीणा की अध्यक्षता और एडीजी जोन भानु भाष्कर की सदस्यता वाली दो सदस्यीय एसआइटी का गठन किया था। एसआइटी ने पिछले दिनों जांच रिपोर्ट शासन को सौंप दी थी। बताया जा रहा था कि एसआइटी की जांच में धार्मिक कट्टरता के आरोप सही पाए गए थे और यह भी पता चला था कि वीडियो मंडलायुक्त आवास पर ही बनाए गए। एसआइटी के पास ऐसे लगभग 80 वीडियो और पूर्व मंडलायुक्त द्वारा लिखी गई सात किताबें हैं।

अब इस प्रकरण में नया तथ्य सामने आया है। पूर्व मंडलायुक्त ने सीटीएस बस्ती वालों पर मतांतरण कराने का दबाव डाला था, यह आरोप लगा था, मगर एसआइटी की जांच में कहा गया है कानपुर में सचेंडी के एक गांव में उन्होंने मतांतरण कराया था। उन्नाव और औरैया में भी उन्होंने मतांतरण कराया। बड़ी बात यह कि पूर्व मंडलायुक्त का नेटवर्क पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में भी मिला है। मतांतरण का खेल उन्होंने सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जैसे जिलों में भी किया। एसआइटी को मतांतरण के कई प्रकरणों का पता चला है और दावा किया जा रहा है कि पूछताछ में पूर्व मंडलायुक्त ने इसे कबूल भी किया है, लेकिन अपने किए पर उन्हें कोई पछतावा नहीं है। उन्होंने धार्मिक कट्टरता की तकरीरें, भड़काऊ साहित्य और मतांतरण सभी को जायजा माना है।

Edited By: Abhishek Agnihotri