बांदा, जेएनएन। आजादी के आंदोलन में बुंदेलों की शौर्य गाथा जाननी-समझनी हो तो बांदा शहर से करीब चार किलोमीटर दूर भूरागढ़ दुर्ग (किला) घूम लीजिए। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की वीरता और ब्रिटिश हुकूमत की बर्बरता का यह गवाह है।

गजेटियर के मुताबिक, 14 जून 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध शुरू होने पर बुंदेलखंड में उसका नेतृत्व बांदा के नवाब अली बहादुर द्वितीय ने किया था। इस क्रांति में अंग्रेजों का साथ देकर रणछोड़ सिंह दउवा ने गद्दारी की थी। यह विद्रोह इतना भयानक था कि इसमें इलाहाबाद (अब प्रयागराज), कानपुर और बिहार के क्रांतिकारी भी आ गए थे। क्रांतिकारियों ने ज्वाइंट मजिस्ट्रेट मि. काकरेल की हत्या 15 जून 1857 को कर दी थी। 16 अप्रैल 1858 में हिटलक का आगमन हुआ, जिससे बांदा की विद्रोही सेना ने युद्ध किया था।

इसमें तीन हजार क्रांतिकारी भूरागढ़ दुर्ग में मारे गए थे, लेकिन बांदा गजेटियर में केवल आठ सौ लोगों के शहीद होने का जिक्र है। 18 जून 1859 में 28 व्यक्तियों के नाम विशेष तौर पर मिलते हैं, जिन्हें अंग्रेजों की अदालत में मृत्युदंड व काला पानी की सजा सुनाई गई थी। भूरागढ़ दुर्ग के आसपास अनेक शहीदों की कब्र हैं। इसी युद्ध में सरबई के पास नटों ने भी बलिदान दिया था, जिसका स्मारक नटबली दुर्ग के नीचे बना है। मकर संक्रांति के अवसर पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रतिवर्ष एक मेले का आयोजन बुंदेलखंड पर्यटन विकास समिति कराती है।

इतिहासकार शोभाराम कश्यप बताते हैं, भूरागढ़ किला 1857 की क्रांति का केंद्र था। 1857 की क्रांति में जब जनरल ह्यूरोज ने झांसी को घेर लिया था, तब रानी लक्ष्मीबाई ने बानपुर के राजा मर्दन सिंह के हाथ बांदा नवाब अली बहादुर को राखी और चि_ी भेजकर मदद मांगी थी। तब उन्होंने मुनादी कराई कि जिसे झांसी जाना हो वह भूरागढ़ में एकत्र हो जाएं। तब तीन दिनों में आसपास के क्रांतिकारी अपना घोड़ा और तलवार लेकर पहुंचे थे। नवाब झांसी तो पहुंच गए, लेकिन रतन सिंह ने अंग्रेजों की मदद से भूरागढ़ में कब्जा कर लिया था। इस युद्ध में भूरागढ़ किले में 33 सौ लोगों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। हालांकि, अभी तक यह विकास की बाट जोह रहा है।

Edited By: Akash Dwivedi