इतिहास में ऐसे तमाम नायकों की गौरवगाथाएं दर्ज हैं, जिन्होंने अंग्रेजों के जुल्म के सामने सिर झुकाना कभी स्वीकार नहीं किया। जब तक जिए, सिर उठाकर जिए। ऐसे ही क्रांतिकारी थे अलीगढ़ के ठाकुर नवाब सिंह चौहान, जिन्होंने सारा जीवन इसी प्रयास को समर्पित कर दिया कि कैसे सभी भारतीयों को स्वाभिमान से जीने का हक मिले...।

ठाकुर नवाब सिंह भले ही गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे, लेकिन स्वाधीनता की प्रेरणा उन्हें शहीद भगत सिंह द्वारा स्थापित नौजवान भारत सभा की गतिविधियों की खबरों से मिली थी। 1930 में अलीगढ़ शहर के विभिन्न भागों में नौजवान भारत सभा के स्वयंसेवकों के लिए सत्याग्रह आश्रम खोले गए थे। अलीगढ़ के धर्म समाज (डीएस) कालेज के सामने अचलताल के पास मढ़ी नामक स्थान पर आश्रम संचालित था। आश्रम में अंग्रेजों की क्रूरता की कहानियां सुनाई जातीं। यहां स्वयंसेवक स्वाधीनता के लिए गोपनीय रूप से चिंतन-मनन करते थे। यहां ठाकुर नवाब सिंह कई बार गए। धीरे-धीरे यह आश्रम अंग्रेजों की नजर में आ गया। आश्रम के संचालक राधाचरन को डाकू घोषित कर मौत के घाट उतार दिया गया। अंग्रेजों के इस जुल्म से नवाब सिंह व उनके साथियों का हृदय द्रवित हो उठा। इसके बाद उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य देश की स्वतंत्रता रह गया। बदले में पीठ पर लाठियां मिलीं और भारतीय होने का ताना। जेल भी जाना पड़ा, लेकिन सम्मान और स्वाभिमान के लिए अंग्रेजों के सामने डटे रहे।

आजादी के जुनून ने जोड़ा आंदोलन से

16 दिसंबर, 1909 को अलीगढ़ में जन्मे ठाकुर नवाब सिंह के जमींदार पिता ठाकुर बलवंत सिंह चौहान का अंग्रेज सम्मान तो करते थे मगर मानसिकता वही थी, जो आम भारतीयों के प्रति थी। अंग्रेजों की हरकतों से नवाब सिंह में उनके प्रति नफरत और देश की स्वतंत्रता का जुनून बढ़ता रहा। छात्र जीवन में ही नवाब सिंह जनपद के सभी क्रांतिकारियों की संपर्क में आ गए। यह वही समय था, जब महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह अंग्रेजों से बचने के लिए अलीगढ़ के गांव शादीपुर में शिक्षक बनकर रह रहे थे। क्रांतिकारी टोडरमल ने उनकी मदद की थी। नवाब सिंह टोडरमल व अन्य क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।

वरिष्ठ साहित्यकार व लेखक डा. वेदप्रकाश अमिताभ बताते हैं कि ठाकुर नवाब सिंह को जनपद ही नहीं, देशभर में क्रांतिकारियों को सूचनाएं पहुंचाने, रात में नुक्कड़ सभाएं आदि करके लोगों को जागरूक करने का काम मिला था। 1940 में जब सुभाष चंद्र बोस जिले के हरदुआगंज में सम्मेलन को संबोधित करने आए तो ठाकुर नवाब सिंह ने उनसे मुलाकात की। बाद में ठाकुर नवाब सिंह महात्मा गांधी के संपर्क में आए और उनके सत्याग्रह आंदोलन से जुड़ गए। मुंबई में क्रांतिकारी गतिविधियों में संलिप्त रहने के संदेह में ठाकुर मलखान सिंह के साथ ठाकुर नवाब सिंह, मोहनलाल गौतम, टोडरमल, मास्टर अनंतराम वर्मा, तसद्दुक अहमद शेरवानी की गिरफ्तारी हुई। हालांकि, बाद में सभी रिहा कर दिए गए।

ओजस्वी कविताओं से शंखनाद

स्वाधीनता की लड़ाई में ठाकुर नवाब सिंह ने लेखन से लोगों को जागरूक करने का काम किया। वरिष्ठ साहित्यकार डा. पशुपति नाथ उपाध्याय बताते हैं कि ठाकुर नवाब सिंह की आजादी की कविताओं से युवा सीधे प्रभावित होते थे। एक कविता के कुछ अंश इस प्रकार है- ‘भारत माता तेरी जय हो/है तेरे आंगन में बहतीं, सरिताओं की निर्मल धारा।/ हरा-भरा आंचल है तेरा, सुंदर सुखकर प्यारा-प्यारा।/तेरे प्रिय पावन प्रकाश से, सुभग शांति का सूर्य उदय हो।/भारत माता तेरी जय हो।’ ठाकुर नवाब सिंह ‘कंज’ उपनाम से कविताएं लिखते थे। कई बार तो युवा उनकी कविता सुनते-सुनते इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाने शुरू कर देते।

जब ठाकुर नवाब सिंह ने देखा कि कविताओं का आम जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ता है तो वे गांव-गांव जाकर लोगों में कविता के जरिए क्रांति की अलख जगाने लगे। फिर ‘संग्राम’ नामक पत्रिका भी निकाली। सामूहिक आयोजन, जलसों व अन्य आयोजनों में नवाब सिंह इस पत्रिका की प्रतियां लोगों को बांटते। इसमें स्वतंत्रता सेनानियों पर अंग्रेजों के जुल्म संबंधी समाचार व लेख प्रकाशित होते थे, जिन्हें पढ़कर स्वाधीनता की इच्छा करने वाले हर व्यक्ति की भृकुटियां तन जातीं, मुट्ठियां भिंच जाती थीं।

उनकी कविताओं और पत्रिका ने खूब जन-जागृति पैदा की। कालेज में क्रांतिकारी गतिविधियां तेज हो गई थीं। इसकी भनक अंग्रेजों को लग गई। तब नवाब सिंह समेत 32 छात्रों को निष्कासन के नोटिस दिए गए। अधिकांश छात्र केवल अध्ययनरत रहने का आश्वासन देकर मुहिम से अलग हो गए, लेकिन नवाब सिंह व उनके कुछ साथी (त्रिलोकीनाथ, रामगोपाल आजाद, लज्जाराम आदि) ने ठान लिया कि उनकी जरूरत देश को ज्यादा है। जिसके बाद कालेज का परित्याग कर स्वाधीनता संग्राम में कूद गए।

एक आवाज पर निकल पड़ते थे लोग

ठाकुर नवाब सिंह के बेटे ठाकुर योगेंद्र सिंह चौहान बताते हैं कि पिता जनपद के प्रमुख क्रांतिकारियों में रहे। वे कविताओं व उद्बोधन से लोगों को निरंतर जागरूक करते थे। लोगों में यह भावना पैदा हो गई कि यदि एकजुट होकर संघर्ष करेंगे तो निश्चित ही आजादी मिल सकती है। उनके एक इशारे पर क्षेत्र के लोगों का रेला उमड़ पड़ता था। 1940 में सत्याग्रह हुआ तो ठाकुर नवाब सिंह काफी संख्या में ग्रामीणों के साथ नेशनल एसोसिएशन के रेलवे रोड स्थित कार्यालय (अब कांग्रेस दफ्तर) के सामने इकट्ठा हुए।

यहां हाथरस के छेदालाल, नगला पदम के खेम सिंह नागर, साहब सिंह, अधिवक्ता फारुखी समेत अनेक स्वतंत्रता सेनानी भी मौजूद थे। सभी गिरफ्तार हुए, फिर नजरबंद कर दिए गए। देश आजाद हुआ। इसके बाद ठाकुर नवाब सिंह सक्रिय राजनीति में शामिल हुए। 1948 में हाथरस जिले के सिकंदराराऊ से विधायक चुने गए। फिर 1952 में राज्यसभा पहुंचे और करीब 11 साल तक उच्च सदन के सदस्य रहे। पांच अप्रैल, 1981 को दुनिया से विदा हो गए।

Edited By: Abhishek Agnihotri