कानपुर, जेएनएन Dilip Kumar Memories :ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार का शहर से गहरा नाता रहा है। वह पारिवारिक सदस्यों और रिश्तेदारों से मिलने के लिए आठ बार कानपुर आए थे। उनके अभिनय, शख्सियत और जिंदादिली का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोलता था। उनकी एक झलक पाने के लिए लोग बेताब रहते थे। कानपुर आना उन्हेंं दिली सुकून देता था। यहां आकर वह सिर्फ घर-परिवार की ही बातें किया करते थे। 1971 में हलीम मुस्लिम कालेज में आयोजित मुशायरे में उनके आने की खबर लोगों को लगी तो एक झलक पाने के लिए सड़कों पर हुजूम हो गया। पुलिस और प्रशासन ने भी हाथ खड़े कर दिए। ऐसे में दिलीप कुमार को कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने और वहां से वापस आने के लिए बुर्का पहनना पड़ गया। उनके जाने से प्रशंसक और चाहने वाले गमगीन हैं। उनके साथ बिताए समय को याद कर रहे हैं।

फिल्मों की नहीं सिर्फ परिवार की बातें : शहर के बड़े कारोबारी सैय्यद तारिक इब्राहिम के मुताबिक उनके ससुर महमूद हलीम से दिलीप कुमार की बचपन से गहरी दोस्ती रही है। महमूद हलीम के बड़े भाई फजल हलीम के साथ पेशावर में पढ़ते थे। तबसे पारिवारिक संबंध हो गए। दिलीप कुमार उनके यहां 1960 से आ रहे थे। वह स्वरूप नगर के बशीर लॉज स्थित घर में रुकते थे। कानपुर में उन्हेंं फिल्मी बातें करना पसंद नहीं था। सिर्फ परिवार की बातें करते थे। फिल्मों के लिए मुंबई आने को कहते थे।

यूसुफ चचा के नाम से जाने जाते : तारिक इब्राहिम ने बताया कि दिलीप कुमार को घर में सभी यूसुफ चचा के नाम से संबोधित किया करते थे। उन्हेंं घर का बना नॉनवेज पसंद था। उनके लिए स्पेशल कबाब, शीरमल आदि व्यंजन बनाए जाते थे। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हंसी ठिठोली करते थे। उन्हेंं खिंचाई करना भी पसंद था। पत्नी वासिया इब्राहिम और बच्चों को आशीर्वाद देकर जाते थे।

आखिरी बार 1982 में आए : परिवारिक मित्र तारिक खान ने बताया कि दिलीप कुमार आखिरी बार 1982 में शहर आए। लखनऊ में शादी समारोह और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सन 2000 के आसपास आए थे।

कानपुर में एयरपोर्ट न होने का मलाल : दिलीप कुमार को कानपुर में एयरपोर्ट न होने का मलाल था। वह मुंबई से लखनऊ तक फ्लाइट से आते थे। उसके बाद कार से शहर आते थे। 

Edited By: Akash Dwivedi