कानपुर, जेएनएन। आज से 101 वर्ष पहले 21 जनवरी को शहर में पहले स्वदेशी भंडार का उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था। उद्घाटन से कुछ घंटे पहले ही कार्यक्रम में शामिल होने आए एक युवक की हादसे में मृत्यु की वजह से उन्होंने उद्घाटन से पहले निकलने वाले जुलूस का कार्यक्रम निरस्त करा दिया था।महात्मा गांधी स्वदेशी भंडार का उद्घाटन करने के बाद उस युवक के घर भी गए।

प्रयाग में महात्मा गांधी को मोतीलाल नेहरू से मिलना था। इसके बाद उन्हें 21 जनवरी को दिल्ली वापस लौटना था। प्रयाग से ट्रेन कानपुर होते हुए ही दिल्ली जानी थी। कानपुर के लोगों को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने महात्मा गांधी को कानपुर में कुछ घंटे रुककर स्वदेशी भंडार का उद्घाटन करने का आग्रह किया। इस स्वदेशी भंडार को खोलने के पीछे सबसे बड़ा प्रयास मौलाना हसरत मोहानी का था। महात्मा गांधी उनका आग्रह टाल न सके। खुद महात्मा गांधी ने कानपुर की इस यात्रा का उल्लेख अपनी डायरी में किया था।

उन्होंने कानपुर को मुंबई की तरह ही व्यापार और कपड़ा मिलों का बड़ा केंद्र बताया था। वह प्रयाग से कानपुर के लिए ट्रेन से चल दिए थे। ट्रेन आने में चार घंटे लगते थे। कानपुर में उनके स्वागत की तैयारियां चल रही थीं। वहीं एक घोड़ा गाड़ी में लगा घोड़ा अचानक बिदक गया और लातें मारने लगा। उस गाड़ी के पास ही अब्दुल हफीज नाम का एक युवक खड़ा था जो समाज सेवा के कार्यों से जुड़ा था। घोड़े की लात का प्रहार उसकी छाती पर लगा और वह वहीं गिर गया। मौके पर ही उसका निधन हो गया। जहां खुशी का जुलूस निकलना था वहां दुख का माहौल हो गया।

महात्मा गांधी को यह सूचना स्टेशन पर ही दे दी गई। उन्होंने सबसे पहले जुलूस को न निकालने की बात कही। उन्होंने भंडार का उद्घाटन कर उस युवक के घर जाने की बात कही। इसके बाद आयोजकों ने जुलूस का कार्यक्रम निरस्त कर दिया और महात्मा गांधी सीधे स्वदेशी भंडार गए। भंडार का उद्घाटन करने के बाद वह अब्दुल हफीज के घर गए और परिवार से बात की।

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