कानपुर, जेएनएन। खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए शहर में लगातार प्रतियोगिताएं होती रहती हैं। इसमें खेल अधिकारियों से लेकर कोच व अन्य स्टाफ तक का महत्व होता है। हालांकि वे कभी कभी अपने दायित्व पर खरे नहीं उतरते। रियल जर्नलिज्म में कुछ ऐसे ही मामलों को पवेलियन से कालम के जरिये सामने ला रहे हैं अंकुश शुक्ल।

प्रदर्शन से ज्यादा पउआ का दबदबा

क्रिकेटरों के भविष्य को तय करने वाले एसोसिएशन में इन दिनों संकट के काले बादल छाए हुए हैं। हाल में एक महिला क्रिकेटर द्वारा लीक किए गए ऑडियो में सीनियर चयनकर्ता व एक जिले के पदाधिकारी खिलाड़ी से प्रदर्शन नहीं बल्कि पउआ को तवज्जो देने की बात कहते सुनाई दे रहे हैं। इस ऑडियो ने एक बार फिर आला अधिकारियों की नींद हराम कर दी। एसोसिएशन में सरगर्मी के साथ तरह-तरह की चर्चाएं सुनी जा रही हैं। हर कोई इस दबे सूत्र वाक्य के जगजाहिर होने पर चुटकियां लेता नजर आ रहा है। प्रदेश टीम का हिस्सा रह चुकी क्रिकेटर ने खुद के प्रदर्शन के साथ उनके स्थान पर चयनित होने वाली खिलाड़ी का हवाला देते हुए सीनियर चयनकर्ताओं से फैसला करने की बात कही। इतना सुनते ही चयनकर्ता व अधिकारी की बोलती बंद हो गई। अंत में उन्होंने मामला मेरठ वाले दरबार से हल होने की बात कह दी।

बड़े दरबार की मुहर जरूरी

महिला क्रिकेटरों की चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी अधिकारी खिलाडिय़ों के नाम फाइनल करने से कतराते रहे। उनके विभाग के एक बड़े बाबू से जब इस बारे में पूछा गया तो बोले, लिस्ट फाइनल हो गई है बस, बड़े दरबार की मुहर लगनी बाकी है। जब उनको बताया गया कि टीम सीरीज खेलने वाले स्थान के लिए निकल चुकी है, तो पल्ला झाड़ते हुए मेरठ वाले साहब तक बात पहुंचाने का दंभ भरने लग गए। जब नाम बड़े दरबार में फाइनल होते हैं तो कैंप में चयनकर्ताओं का क्या काम? इस सवाल पर बोले, प्रक्रिया नियमानुसार ही होगी। उभरती प्रतिभाओं के भविष्य के साथ कुछ इस तरह से खिलवाड़ चलता रहता है। चयन प्रक्रिया के तहत कैंप महज दिखावा बनकर रह जाते हैं। नाम फाइनल करने की बारी आती है तो गेंद आला अधिकारियों के पाले में फेंक दी जाती है ताकि मीडिया में नाम उनका ही उछले।

झूठे वादों में साहब का जवाब नहीं

ग्रीनपार्क स्टेडियम में इन दिनों लखनऊ वाले साहब के झूठे वादों की बयार कोच व खिलाडिय़ों के साथ एसोसिएशन के कर्ताधर्ताओं के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है। वह पिछले दिनों स्टेडियम का निरीक्षण करने पहुंचे। अत्याधुनिक जिम का हर कोने से जायजा लेने के बाद 15 फरवरी तक खेलमंत्री से उद्घाटन कराने की घोषणा कर दी। यही नहीं, खेल की कमान संभाले अधिकारी को दूसरे जिलों में सेवाएं देने के लिए तैयार रहने का हुक्म सुना दिया। मगर, तारीख बीत गई पर उनकी कोई बात सच नहीं निकली। उनके कुछ साथी याद भी दिला चुके हैं लेकिन उन्हें सुनने की फुर्सत नहीं है। फिटनेस संवारने का सपना देखने वाले खिलाड़ी जिम के खुलने की आस लगाए बैठे हैं। वहीं, यहां के साहब दूसरे जिले में सेवाएं देने की बात मन से निकालकर फिर से स्टेडियम को अंतरराष्ट्रीय सुविधाओं से सुसज्जित करने के पुलिंदे बांधते नजर आ रहे हैं।

ट्रैक सूट भी नहीं दिला पा रहे साहब

राष्ट्रीय पदक हासिल कर विश्वविद्यालय का नाम रोशन करने वाले खिलाडिय़ों को साहब की अनदेखी से घोर निराशा हो रही है। देश भर के विश्वविद्यालयों में अव्वल रहने वाले खिलाडिय़ों को अभी तक न तो प्रमाण पत्र मिला है और न ही ट्रैक सूट। आर्थिक रूप से कमजोर तबके के खिलाडिय़ों ने कई बार साहब की चौखट पर हाजिरी लगाई लेकिन हर बार उनको खाली हाथ लौटना पड़ा। जब मामला तूल पकड़ा तो साहब की दरियादिली का नजराना सामने आया। उन्होंने अपने कुछ चहेतों को ट्रैक सूट देकर अन्य खिलाडिय़ों की दुखती रग दबा दी। ऐसे में उनका गुस्सा फूटना लाजिमी था। खिलाडिय़ों ने ऊपर तक शिकायत करके उनका जीना दुश्वार कर दिया। रोज-रोज की किच-किच से आजिज आकर साहब अब बजट आते ही प्रमाण पत्र के साथ ट्रैक सूट देने की बात कहते नजर आ रहे हैं। मगर, इसकी तारीख बताने में अभी भी बगले झांकने लग जाते हैं। 

Posted By: Abhishek

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