कानपुर, जागरण संवाददाता : पतित पावनी गंगा को साफ करने के नाम पर केवल कागजी कवायद हो रही है। 25 साल में सफाई के नाम पर शहर में अब तक सात अरब रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन नतीजा गंगा साफ होने के बजाए और दूषित हो गई है। रोज 460 एमएलडी सीवरेज का पानी निकल रहा है ट्रीट करने की क्षमता केवल 162 एमएलडी है इसमें भी सिर्फ सौ एमएलडी ही पानी ट्रीट हो पा रहा है। बाकि बचा सीवरेज का गंदा पानी नाले के माध्यम से सीधे गंगा में जा रहा है। अदालत की फटकार और शासन की निगरानी के बाद भी सीवर का गंदा पानी गंगा में गिर रहा है। ऐसे में सरकारी आंकड़ों के आधार पर ही जवाबदेह अधिकारी कठघरे में हैं।

शहर में मोक्षदायिनी गंगा की सफाई का सफर वर्ष 1989 में पहली बार शुरू हुआ। नीदरलैंड सरकार की मदद से गंगा एक्शन प्लान चलाया गया। दो चरण में गंगा एक्शन प्लान शुरू हुआ। इसमें 166 करोड़ रुपये खर्च किए गए। देश में पांच एमएलडी का पहला ट्रीटमेंट प्लांट कानपुर में लगाया गया। उस समय शहर से गंगा में 200 एमएलडी गंदा पानी गिरता था, लेकिन सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट 162 एमएलडी का बनाया गया। इस तरह 38 एमएलडी गंदा पानी गंगा में ही गिरता रहा। बीते 25 सालों में शहर का विस्तार होने के साथ गंदे पानी की मात्रा भी बढ़ती गई। सरकारी आंकडे़ बताते हैं कि वर्तमान में शहर से 460 एमएलडी सीवेज रोज निकलता है, जबकि सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता सिर्फ 162 एमएलडी पानी ही ट्रीट करने की है। इसमें भी सौ एमएलडी ही ट्रीट हो पा रहा है। 360 एमएलडी दूषित पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। फिर गंगा को साफ करने के लिए वर्ष 2005 में जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्यूवल मिशन योजना लायी गयी। इसके तहत तीन फेज में योजना चल रही है 548 करोड़ रुपये खर्च होने है लगभग पैसा खर्च हो चुका है। इस योजना को दिसंबर 2012 तक चालू करना था लेकिन दो साल गुजरने को है फिर गंगा की सफाई तो दूर अभी तक एक भी सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं बन पाए है। तीन सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट विवादों में फंस गए है। 310 एमएलडी क्षमता के सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बन रहे है। इनके चालू होने से गंगा में दूषित पानी गिरना कम हो जाएगा।

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गंगा का वर्तमान में हाल

- जाजमऊ में दूषित पानी ट्रीट करने के लिए 171 एमएलडी के सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए गए। इसमें नौ एमएलडी टेनरी का पानी शुद्ध होता है। इस हिसाब से 38 एमएलडी फिर भी गंदा पानी गिरता रहा।

- शहर की आबादी के साथ दूषित पानी की मात्रा भी बढ़ती गयी। वर्ष 2000 तक 350 एमएलडी दूषित पानी शहर से निकलने लगा। इस हिसाब से 188 एमएलडी गंदा पानी गंगा में गिर रहा था।

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पानी आचमन लायक भी नहीं

गंगा के घाटों में नाले खुले आम गिर रहे है। हालत यह है कि आचमन लायक भी पानी घाट में नहीं है। पचास हैजेन तक काला पानी है।

गंगा में गिर रहे ये नाले

सीसामऊ नाला, टैफ्को नाला, परमट नाला, जेल नाला, सरसैया घाट नाला, अवधपुरी नाला, चिड़ियाघर नाला, ज्यौरा नाला, एएनडी कॉलेज नाला, रानी घाट नाला, गुप्तार घाट नाला, भगवतदास घाट नाला, गोल्फ क्लब नाला, टपका नाला, सिद्धनाथ घाट नाला, बुढि़याघाट नाला, सरैया नाला, वाजिदपुर नाला।

घाट के पास बनी बस्तियां भी बनी मुसीबत

घाट के पास बनी बस्तियों का दूषित पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। इसको भी रोकना होगा। सीवरेज का पानी ट्रीट हो जाएगा फिर भी गंगा साफ नहीं होगी जब तक बस्तियों से गंगा में आ रहे गंदे पानी को रोका नहीं जाएगा।

जनता हो जागरूक

गंगा को साफ रखने के लिए जनता को भी जागरूक होना होगा। मूर्तियां, पालीथिन व पूजा की सामग्री न फेंके और न लोगों को फेंकने दे।

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जेएनएनयूआरएम योजना के तहत 310 एमएलडी सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बन रहे है। साथ ही पाइप डालने का काम चल रहा है। दिसंबर 2014 तक यह योजना पूरी हो जाएगी। सीधे गंगा में गिर रहा सीवर का पानी ट्रीट करके डाला जाएगा। और नालों को टेप कर दिया जाएगा। तेजी से काम चल रहा है।

- राजेश कुमार, परियोजना प्रबंधक, गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई जल निगम

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