कानपुर, नगर प्रतिनिधि: पॉलीथिन के लिए सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों के बावजूद शहर में पॉलीथिन की बिक्री रुक नहीं रही। मॉल हो या बाजार हर जगह पॉलीथिन का प्रयोग है। कार्रवाई की गेंद प्रदूषण नियंत्रण विभाग और नगर निगम के बीच लुढ़क रही है। चाहे गंगा का तट हो या शहर के नाले, हर जगह भारी संख्या में पॉलीथिन के ढेर लगे हुए हैं।

शहर और गंगा के घाटों को पालीथिन मुक्त रखने के लिए मुख्यमंत्री ने भले ही जिलाधिकारियों की जवाबदेही तय कर दी है, लेकिन घाटों पर पालीथिन का अंबार है। इस अभियान के लिए प्रशासन की तरफ से कोई कार्ययोजना भी नहीं तैयार है। कानपुर के सभी घाटों पर (परमट, सिद्धनाथ और गोलाघाट) बड़े पैमाने पर पॉलीथिन में फूल-माला भरकर लोग गंदगी फैला रहे हैं। कोई भी घाट ऐसा नहीं है, जहां नगर निगम, जिला प्रशासन या मंदिर प्रशासन की ओर से गंगा गंदी करने वाले भक्तों को रोकने वाला गंगा भक्त तैनात हो। नगर निगम ने घाटों पर पॉलीथीन के प्रयोग पर 200 रुपये जुर्माने के प्रावधान वाला सूचना पट लगा रखा, लेकिन बोर्ड के नीचे ही बड़े पैमाने पर पालीथिन पड़ी हैं। अक्सर कई लोग पॉलीथिन में फूलमाला डालते दिखाई पड़ते हैं। हालांकि इसकी मॉनीटरिंग या जुर्माना करने वाला कोई नहीं है।

प्रदूषण नियंत्रण विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो शहर में करीब 200 पालीथिन फैक्ट्रियों में निर्माण हो रहा है। मानकों के अनुरूप 40 माइक्रोन से कम मोटाई की पॉलीथिन बनाने पर प्रतिबंध है। इस वर्ष करीब आधा दर्जन फैक्ट्रियों पर मानक के विपरीत पॉलीथिन बनाने पर प्रतिबंध लगा हुआ है।

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'हमारा काम पालीथिन की फैक्ट्रियों पर रोक लगाना नहीं बल्कि निर्धारित मानक के विपरीत बन रही पॉलीथिन के निर्माण को रोकना है।' -टीयूखान, स्थानीय निदेशक, प्रदूषण नियंत्रण विभाग।

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